जीतने वाला माइंडसेट: The Gita Way to Master Your Mind

Published: 3 मई 2026 जीतने वाला माइंडसेट: The Gita Way to Master Your Mind 🇺🇸 Read in English

खुद से एक सवाल पूछो —

आखिरी बार कब हुआ था जब किसी ने कुछ बुरा कहा — और पूरा दिन खराब हो गया?

आखिरी बार कब हुआ था जब एक छोटी सी असफलता ने हफ्ते भर के लिए तोड़ दिया?

आखिरी बार कब हुआ था जब किसी की सफलता देखकर भीतर कुछ जल उठा?

ये सब प्रतिक्रियाएँ सामान्य लगती हैं। दुनिया यही करती है। लेकिन एक सवाल है —

क्या यही "सामान्य" होना जीत है? या जीत कुछ और होती है?

डॉ. APJ अब्दुल कलाम — वो इंसान जिसने एक छोटे से कस्बे की तंग गलियों से निकलकर भारत का मिसाइल कार्यक्रम खड़ा किया। जो एक बार नहीं, कई बार असफल हुए। जिन्हें अस्वीकृति मिली, जिन्हें नज़रअंदाज़ किया गया — फिर भी टूटे नहीं।

क्यों?

क्योंकि उनका मन "साम्य में स्थित" था। सफलता और असफलता — दोनों में एक जैसी स्थिरता।

और यह कोई संयोग नहीं था। यह एक mindset था। वही mindset जो भगवद गीता 5:19 में बताया गया है।

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥

— भगवद गीता, अध्याय 5, श्लोक 19

जिनका मन साम्य भाव में स्थित है — उन्होंने इसी जन्म में सृष्टि को जीत लिया। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है — इसलिए वे ब्रह्म में स्थित हैं।

श्लोक को समझते हैं — शब्द दर शब्द

"इहैव" — इसी जन्म में। अभी। यहीं। कोई अगला जन्म नहीं, कोई बाद की बात नहीं।

"तैर्जितः सर्गः" — उन्होंने सृष्टि को जीत लिया। पूरी सृष्टि पर विजय। लेकिन यह जीत बाहर की नहीं — भीतर की है।

"येषां साम्ये स्थितं मनः" — जिनका मन साम्य भाव में स्थित है। साम्य यानी समता — सुख में भी, दुख में भी, जीत में भी, हार में भी — एक जैसा मन।

"निर्दोषं हि समं ब्रह्म" — ब्रह्म निर्दोष है और सम है। परमात्मा की प्रकृति ही समता है।

"तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः" — इसलिए वे ब्रह्म में स्थित हैं। जिनका मन सम है — वे परमात्मा के सबसे निकट हैं।

डॉ. APJ अब्दुल कलाम — जिन्होंने सच में "सर्ग" जीता

सन् 1979 में भारत का पहला SLV रॉकेट प्रक्षेपण हुआ।

असफल हो गया।

कलाम ने वह असफलता देखी। वह दर्द महसूस किया जो किसी भी वैज्ञानिक को तब होता है जब वर्षों की मेहनत एक पल में बिखर जाती है।

लेकिन उसके बाद क्या हुआ?

कलाम ने संवाददाता सम्मेलन में खड़े होकर कहा — "यह मेरी ज़िम्मेदारी है। दल की गलती नहीं।"

उन्होंने दोष नहीं दिया। टूटे नहीं। रुके नहीं।

और 1980 में — मात्र एक वर्ष बाद — SLV-3 ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी। भारत अंतरिक्ष युग में प्रवेश कर गया।

यही "साम्ये स्थितं मनः" है।

असफलता ने उन्हें नहीं तोड़ा — क्योंकि उनका मन असफलता से परिभाषित नहीं होता था। सफलता ने उन्हें अहंकारी नहीं बनाया — क्योंकि उनका मन सफलता से भी ऊपर था।

यही वो mindset है जिसे गीता "इहैव जित" कहती है — इसी जन्म में जीतना।

अब असली सवाल — "साम्य भाव" क्या सफलता की परवाह न करना है?

बिल्कुल नहीं। और यहीं पर सबसे बड़ी गलतफहमी होती है।

श्रील प्रभुपाद Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक की व्याख्या में लिखते हैं — "इहैव" सबसे महत्वपूर्ण शब्द है। यह जीत मृत्यु के बाद नहीं मिलती। यह अभी मिलती है — इसी जीवन में — जब मन समता में स्थिर हो जाता है। और यह समता कमज़ोरी नहीं है। यह सर्वोच्च शक्ति है। जो इंसान सुख-दुख, जय-पराजय में एक जैसा रहता है — वह दुनिया की किसी भी परिस्थिति से नहीं टूटता।

स्वामी मुकुन्दानन्द जी बहुत सुंदर बात कहते हैं — वे कहते हैं कि "साम्य" का अर्थ उदासीनता नहीं है। उदासीन इंसान को कुछ फर्क नहीं पड़ता — न जीत से, न हार से। लेकिन "साम्य में स्थित" इंसान पूरी लगन से काम करता है — जीतने के लिए लड़ता है — लेकिन परिणाम उसकी आत्मा को नहीं हिलाता। यह बहुत बड़ा अंतर है।

गीता प्रेस की टीका में "निर्दोषं हि समं ब्रह्म" पर विशेष ध्यान दिया गया है — ब्रह्म स्वयं सम और निर्दोष है। इसलिए जो इंसान समता में रहता है, वह ब्रह्म के स्वभाव के निकट होता है। समता केवल एक मनोवैज्ञानिक अवस्था नहीं — यह आध्यात्मिक अवस्था है।

मैं खुद एक सवाल पूछता हूं — क्या यह mindset आज के प्रतिस्पर्धी युग में काम करता है?

न केवल काम करता है — बल्कि यही सबसे कारगर है।

आज की दुनिया में सबसे बड़ी समस्या क्या है?

मन का अस्थिर होना।

एक अच्छी समीक्षा मिली — तो उत्साह आसमान पर।

एक बुरी टिप्पणी आई — तो आत्मविश्वास धरातल पर।

प्रतिदिन मन ऊपर-नीचे होता रहता है — और इसी उठापटक में जीवन की सबसे बड़ी ऊर्जा बर्बाद होती है।

जो मन साम्य में स्थित है — वह इस उठापटक से मुक्त है। और जब ऊर्जा इस उठापटक में नहीं जाती — तो वह ऊर्जा काम में जाती है। सृजन में जाती है। और तब जो परिणाम आता है — वह साधारण नहीं होता।

कलाम जी इसका जीवंत प्रमाण थे।

"सर्ग को जीतना" — इसका असली अर्थ क्या है?

यह श्लोक का सबसे क्रांतिकारी हिस्सा है।

"सर्ग" यानी सृष्टि। और "जितः सर्गः" यानी सृष्टि पर विजय।

लेकिन यह विजय राज्य जीतने की नहीं, धन कमाने की नहीं, पद पाने की नहीं।

यह विजय है — परिस्थितियों से ऊपर उठने की।

जब कोई तुम्हारी आलोचना करे — और तुम्हारा मन न हिले।

जब सब कुछ योजना के अनुसार न हो — और तुम्हारी स्थिरता न टूटे।

जब सफलता मिले — और अहंकार न आए।

यही "सर्ग जीतना" है।

और गीता कहती है — यह जीत इसी जन्म में, इसी जीवन में उपलब्ध है।

जीतने वाला mindset बनाने के 3 तरीके — गीता से

1. प्रतिक्रिया और परिणाम को अलग करो।

प्रभुपाद जी कहते हैं — घटना और उस पर तुम्हारी प्रतिक्रिया के बीच एक क्षण होता है। उस क्षण को पहचानो। उस क्षण में यह पूछो — "क्या यह प्रतिक्रिया मुझे आगे ले जाएगी या पीछे?" यही वह क्षण है जहाँ साम्य भाव की नींव पड़ती है।

2. सफलता और असफलता — दोनों के शिक्षक बनाओ।

स्वामी मुकुन्दानन्द जी का मार्गदर्शन है — जब सफलता मिले तो पूछो "इससे क्या सीखा?" जब असफलता मिले तो भी पूछो "इससे क्या सीखा?" दोनों से एक ही प्रश्न। यह अभ्यास धीरे-धीरे मन को सम बनाता है।

3. प्रतिदिन ब्रह्म से जोड़ो।

गीता प्रेस की टीका स्मरण दिलाती है — "निर्दोषं समं ब्रह्म" यानी परमात्मा स्वयं समता का स्वरूप है। जब तुम प्रतिदिन — चाहे प्रार्थना से, ध्यान से, या गीता पाठ से — परमात्मा से जुड़ते हो, तो उनकी समता धीरे-धीरे तुम्हारे भीतर उतरने लगती है।

अंतिम बात — असली जीत भीतर की है

दुनिया एक जीत परिभाषित करती है — पद, पैसा, प्रसिद्धि।

गीता एक और जीत परिभाषित करती है — भीतर की स्थिरता।

कलाम जी के पास वह भीतरी स्थिरता थी। इसीलिए असफलता उन्हें तोड़ नहीं सकी। इसीलिए सफलता उन्हें बदल नहीं सकी। इसीलिए वे जहाँ भी गए — एक अलग ही ऊर्जा लेकर गए।

श्रीकृष्ण कह रहे हैं — यह तुम्हारे लिए भी संभव है।

इसी जन्म में। इसी जीवन में। इसी पल से।

जब मन साम्य में स्थित होगा — सृष्टि अपने आप जीत जाएगी।

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