भगवद गीता 5.25 — जो अंदर से शांत है, वही ब्रह्म को पाता है

Published: 11 मई 2026 भगवद गीता 5.25 — जो अंदर से शांत है, वही ब्रह्म को पाता है 🇺🇸 Read in English

क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि बाहर से सब ठीक है — नौकरी है, घर है, रिश्ते हैं — फिर भी अंदर कहीं एक खालीपन है? एक बेचैनी जो रात को सोने नहीं देती? जैसे कुछ है जो मिला नहीं, कुछ है जो अधूरा है?

आज की दुनिया में हम सब उस शांति को ढूंढते हैं — कभी नई नौकरी में, कभी नए रिश्ते में, कभी विदेश यात्रा में, कभी सोशल मीडिया के likes में। पर वह शांति मिलती नहीं। थोड़ी देर के लिए लगता है मिल गई, फिर वही बेचैनी वापस आ जाती है। यह इसलिए नहीं कि हम गलत हैं — यह इसलिए है क्योंकि हम उस शांति को गलत जगह ढूंढ रहे हैं।

भगवद गीता के पाँचवें अध्याय में श्रीकृष्ण एक ऐसी बात कहते हैं जो शायद आपने पहले कभी इस तरह नहीं सुनी होगी। वे कहते हैं — असली शांति, जिसे वे ब्रह्म-निर्वाण कहते हैं, वह किन्हीं विशेष लोगों को मिलती है। और वे लोग कोई महाराज या राजा नहीं हैं — वे वो लोग हैं जिन्होंने अपने मन को, अपने अहंकार को, अपनी इच्छाओं को एक खास तरीके से साध लिया है।

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ ५.२५ ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — वे ऋषि जिनके सारे पाप और दोष नष्ट हो गए हैं, जिनके मन में द्वंद्व — यानी "यह करूं या वह करूं", "यह सही है या वह सही है" — वाली उलझन खत्म हो गई है, जिनका मन पूरी तरह संयमित है, और जो सभी प्राणियों के भले में लगे हुए हैं — वे ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त करते हैं।

ब्रह्म-निर्वाण का मतलब है परम शांति — वह अवस्था जहाँ कोई बेचैनी नहीं, कोई भय नहीं, कोई अधूरापन नहीं। यह मोक्ष का ही एक रूप है। और यह शांति मिलती है — चार चीज़ों से: पापों का नाश, द्वंद्व का अंत, मन का संयम, और सबके प्रति प्रेम।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी अपनी प्रसिद्ध टीका साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर बहुत गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं — क्षीणकल्मषाः का अर्थ केवल यह नहीं कि पाप-कर्म बंद हो गए। इसका अर्थ है कि मन के अंदर जो पाप की जड़ें हैं — जैसे लालच, ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार — वे भी नष्ट हो गई हैं।

वे आगे कहते हैं कि छिन्नद्वैधाः — यानी जिनके संशय कट गए हैं — ये वे लोग हैं जिन्हें यह पक्का पता हो गया है कि "मैं देह नहीं हूँ, आत्मा हूँ।" जब तक यह संशय रहता है — "क्या सच में आत्मा है? क्या परमात्मा है? क्या मोक्ष होता है?" — तब तक मन में स्थिरता नहीं आती। स्वामी जी कहते हैं कि साधना का एक बड़ा काम यही है — इन संशयों को जड़ से काटना।

यतात्मानः के बारे में वे बताते हैं कि यह केवल बाहरी संयम नहीं है। खाना कम खाना, बोलना कम — यह तो ऊपरी बात है। असली यतात्मा वह है जिसका मन अंदर से भी संयमित है — जो एकांत में भी उतना ही शुद्ध है जितना भीड़ में। और सबसे जरूरी बात — सर्वभूतहिते रताः — सबके भले में लगे रहना। यह महज दान देना नहीं है। यह एक भाव है — कि मेरे किसी भी काम से किसी को तकलीफ न हो।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी अपनी टीका Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक को एक व्यापक दृष्टि से देखते हैं। वे कहते हैं कि यहाँ ऋषि शब्द का उपयोग बहुत सोचकर किया गया है — ऋषि वह है जो केवल ज्ञान जानता नहीं, बल्कि उसे जीता है।

प्रभुपाद जी बताते हैं कि ब्रह्म-निर्वाण को वे मोक्ष की उस अवस्था से जोड़ते हैं जहाँ जीव भगवान के साथ एकात्म अनुभव करता है — न कि केवल शून्यता में विलीन होता है। उनके अनुसार, जो भक्त कृष्णभावनामृत में स्थित है, उसके लिए यह ब्रह्म-निर्वाण स्वाभाविक रूप से आता है — उसे अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता।

वे एक महत्वपूर्ण बात यह भी कहते हैं कि सर्वभूतहिते रताः — सबके हित में लगे रहना — यह केवल समाजसेवा नहीं है। असली सेवा वह है जो लोगों को भगवान से जोड़े। जो केवल शरीर की सेवा करे पर आत्मा की भूख न मिटाए — वह अधूरी सेवा है। प्रभुपाद जी का मानना था कि संकीर्तन, प्रसाद वितरण, और भागवत-कथा — यही असली सर्वभूतहित है।

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज के मनुष्य की जिंदगी से बड़े सुंदर तरीके से जोड़ते हैं। वे कहते हैं — हम सब अपनी जिंदगी में द्वंद्व से इतने थके हुए हैं। सुबह उठते हैं तो दिमाग में दो आवाजें होती हैं — "यह करना चाहिए, वह नहीं करना चाहिए", "इसे खुश करूं या उसे", "आगे बढूं या रुकूं"। यह द्वंद्व ही सबसे बड़ी थकान है।

स्वामी जी समझाते हैं कि छिन्नद्वैध की अवस्था तब आती है जब मनुष्य को एक स्पष्ट दिशा मिल जाती है — और वह दिशा है भगवान। जब आपको पता हो जाए कि मेरा लक्ष्य क्या है, तो छोटे-छोटे द्वंद्व अपने आप मिट जाते हैं। जैसे कोई नदी जब समुद्र की तरफ बह रही हो, तो रास्ते में आने वाले पत्थरों से वह डरती नहीं — बस बहती रहती है।

स्वामी मुकुन्दानंद जी यह भी बताते हैं कि क्षीणकल्मष की अवस्था रातोंरात नहीं आती। यह एक प्रक्रिया है। हर बार जब हम लालच को रोकते हैं, जब हम किसी की बुराई करने से बचते हैं, जब हम गुस्से को पी जाते हैं — तब एक-एक कल्मष (दोष) धुलता है। यह साधना है — धीरे-धीरे, रोज़ थोड़ा-थोड़ा।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

सोचिए — आपके ऑफिस में एक सहकर्मी है जो हर बार आपके काम की तारीफ के बदले खुद आगे निकल जाता है। पहले आपको गुस्सा आता था, जलन होती थी। पर एक दिन आपने तय किया — "मैं उसके बारे में कुछ बुरा नहीं सोचूँगा। मेरा काम अच्छा होना चाहिए — बाकी भगवान देखेगा।" और धीरे-धीरे वह जलन कम होने लगी। यही है एक कल्मष का धुलना।

या सोचिए — आप रात को सोने जाते हैं और दिमाग में 20 बातें घूम रही हैं। कल की मीटिंग, बच्चे का स्कूल, EMI, रिश्तेदारों की बातें। यह है द्वंद्व। अब अगर आप रोज़ रात बस 10 मिनट भगवान के सामने बैठें — बिना कुछ माँगे, बस उनके साथ रहें — तो धीरे-धीरे वह शोर कम होने लगता है। यही है मन का संयम आना।

और सर्वभूतहित? यह बहुत बड़ी बात नहीं है। घर में खाना बनाते समय थोड़ा पड़ोसी के बच्चे के लिए भी सोचना। ऑफिस में नए आए इंसान को अकेला न छोड़ना। किसी की तकलीफ सुनकर उपदेश देने की जगह बस साथ बैठ जाना — यही सर्वभूतहित है।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: क्या ब्रह्म-निर्वाण केवल संन्यासियों के लिए है?
बिल्कुल नहीं। श्रीकृष्ण यहाँ ऋषि शब्द उस भाव में उपयोग करते हैं — जो जानता हो और जीता हो। एक गृहस्थ भी रोज़ की जिंदगी में इन चार गुणों को साधकर ब्रह्म-निर्वाण की दिशा में बढ़ सकता है।

सवाल: पाप तो बहुत हो चुके जिंदगी में — क्या अब शांति मिल सकती है?
हाँ। भगवान का नाम लेने मात्र से पाप धुलते हैं — यह गीता की ही बात है। और स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — पश्चाताप और संकल्प से बड़ा कोई पाप-नाशक नहीं है। जो आज से बदलने का तय कर ले, उसके पुराने पाप उसे नहीं रोक सकते।

सवाल: मन तो बार-बार भटकता है — क्या यह कभी थमेगा?
मन की प्रकृति ही चंचल है — यह श्रीकृष्ण खुद मानते हैं। पर वे यह भी कहते हैं — अभ्यास और वैराग्य से मन वश में होता है। हर बार जब मन भटके और आप उसे वापस लाएं — वही एक कदम आगे है। धीरे-धीरे रास्ता बनता है।

सवाल: सबके हित में लगे रहना — जब दुनिया खुद स्वार्थी हो, तब यह कैसे करें?
यह सबसे कठिन सवाल है। पर असल में यह आपके लिए है, उनके लिए नहीं। जब आप सबके भले की भावना रखते हैं — तो आपका मन हल्का होता है। दूसरों की स्वार्थ आपको नहीं रोक सकती — आपकी भावना आपके हाथ में है।

सवाल: ब्रह्म-निर्वाण का अनुभव कैसा होता है — क्या कोई संकेत हैं कि हम सही रास्ते पर हैं?
प्रभुपाद जी और स्वामी मुकुन्दानंद जी दोनों कहते हैं — जब छोटी-छोटी बातें परेशान करना बंद कर दें, जब किसी के बुरा कहने पर भी मन शांत रहे, जब अकेलेपन में भी एक भरापन महसूस हो — तो समझो, ब्रह्म-निर्वाण की दिशा में कदम पड़ने लगे हैं।

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🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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