कभी-कभी कोई बात समझाने के लिए हज़ार शब्दों से ज़्यादा एक छोटी सी उपमा काम कर जाती है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण ठीक यही करते हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने बताया था कि युक्त इंसान कैसा होता है — चित्त आत्मा में स्थिर, इच्छाओं से रहित। अब इस श्लोक में वे उसे एक image देते हैं जो हमेशा याद रहेगी।
एक दीया। हवा रहित जगह में जलता हुआ। बिल्कुल स्थिर, बिल्कुल शांत, उसकी लौ ज़रा भी नहीं हिलती। यह image इतनी सरल है कि कोई भी इसे समझ सकता है — पर इसकी गहराई असीम है।
यह श्लोक उन सबके लिए है जो ध्यान की उस अवस्था को imagine करना चाहते हैं जिसकी बात कृष्ण कर रहे हैं। शब्दों से समझाना मुश्किल था — तो कृष्ण ने एक picture दे दी।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ ६.१९ ॥
सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?
श्रीकृष्ण कहते हैं — जैसे हवा रहित जगह में रखा दीया हिलता नहीं — यही उपमा उस योगी के लिए दी गई है जिसका चित्त वश में है और जो आत्मा के योग में अभ्यासरत है।
यह श्लोक पूरी तरह एक उपमा पर टिका है। दीपो निवातस्थो — हवा रहित जगह में दीया। न इंगते — हिलता नहीं। यह स्थिरता ही उस योगी की स्थिरता है जिसका यतचित्तस्य — चित्त वश में है — और जो युञ्जतो योगम् आत्मनः — आत्मा के योग में लगा हुआ है।
साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि
स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर बहुत सुंदर व्याख्या करते हैं। वे कहते हैं — दीये की लौ हवा में इसलिए हिलती है क्योंकि बाहरी शक्ति उसे प्रभावित करती है। पर जब वह हवा रहित जगह में हो — तो कोई बाहरी शक्ति उसे हिला नहीं सकती। वह अपने स्वभाव में स्थिर रहती है।
वे कहते हैं कि मन भी ठीक ऐसा ही है। मन क्यों हिलता है? क्योंकि बाहरी विषय — इच्छाएं, भय, क्रोध, आसक्ति — यह सब "हवा" की तरह मन को हिलाते हैं। जब साधना के द्वारा यह "हवा" — यह बाहरी प्रभाव — कम होती जाती है, तब मन भी दीये की लौ की तरह स्थिर होने लगता है।
स्वामी जी एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं — वे कहते हैं कि यह स्थिरता बाहर से नहीं आती, यह मन के अंदर के परिवर्तन से आती है। जैसे हवा रहित जगह बाहर से व्यवस्था करनी पड़ती है दीये के लिए — वैसे ही साधक को अपने अंदर वह "हवा रहित जगह" बनानी होती है, जहाँ बाहरी विक्षेप मन तक न पहुँचें।
प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़
श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि यह उपमा गीता की सबसे beautiful और सबसे memorable उपमाओं में से एक है। एक साधारण सा दीया — पर इसमें योग की पूरी philosophy समाई हुई है।
वे कहते हैं कि दीये की लौ का स्वभाव प्रकाश देना है — पर जब हवा चलती है, वह काँपती है, असली रोशनी नहीं दे पाती। मन का स्वभाव भी ज्ञान और शांति है — पर जब इच्छाओं और विकारों की हवा चलती है, मन असली प्रकाश नहीं दे पाता। जब वह हवा रुकती है — मन अपने असली स्वभाव में आ जाता है, और तब वह सच्चा प्रकाश देता है।
प्रभुपाद जी एक important बात कहते हैं — वे कहते हैं कि भक्तियोग में यह "हवा रहित जगह" कृष्णभावनामृत से बनती है। जब मन पूरी तरह कृष्ण में डूबा हो — तो बाहरी विषय उसे हिला नहीं पाते। भक्ति खुद वह protective space बन जाती है।
स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या
स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज की भाषा में बहुत सुंदर तरीके से समझाते हैं। वे कहते हैं — आज हम सब लगातार notifications, opinions, expectations की हवा में जी रहे हैं। हर तरफ से कुछ न कुछ हमारे मन को हिला रहा है। ऐसे माहौल में स्थिर रहना लगभग असम्भव लगता है।
वे कहते हैं — पर यह श्लोक बताता है कि स्थिरता बाहरी हवा को रोकने से नहीं आती — स्थिरता एक internal protected space बनाने से आती है। यह protected space ध्यान, भजन, और निरंतर साधना से बनता है। जैसे एक कमरे की दीवारें हवा को रोकती हैं — वैसे ही साधना मन के चारों ओर एक invisible दीवार बनाती है।
स्वामी जी एक बहुत practical बात कहते हैं — वे कहते हैं कि शुरुआत में दीया बहुत काँपता है — मन बहुत अस्थिर होता है। पर रोज़ की साधना से धीरे-धीरे वह "दीवार" मजबूत होती जाती है। एक दिन ऐसा आता है जब बाहर कितना भी तूफान हो — अंदर का दीया स्थिर जलता रहता है।
असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?
सोचिए एक इंसान को जिसके सामने कोई बहुत मुश्किल situation आती है — कोई बुरी खबर, कोई बड़ा challenge। पहले वह इंसान घंटों उस बात में डूबा रहता था, मन हर तरफ भागता था। पर साधना के बाद — वह situation को देखता है, feel करता है, पर अंदर से वह दीया हिलता नहीं। यह है स्थिर मन की झलक।
या ध्यान के दौरान का वह पल — जब अचानक सब कुछ बहुत quiet हो जाता है। कोई thought उठता नहीं, कोई विचलन नहीं। बस एक स्थिर, शांत उपस्थिति — जैसे हवा रहित जगह में दीया। यह क्षणिक हो सकता है शुरुआत में — पर यह असली अनुभव है उस उपमा का।
रोज़ की ज़िंदगी में यह दिखता है — जब कोई आपको provoke करने की कोशिश करे और आप हिलें नहीं। जब चारों तरफ chaos हो और आप अपने केंद्र में टिके रहें। यह वह "हवा रहित जगह" है जो साधना से अंदर बनती है।
मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे
सवाल: क्या यह सम्भव है कि बाहरी दुनिया का असर मन पर बिल्कुल न पड़े?
स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — पूरी तरह असर न पड़ना यह अंतिम अवस्था है, और यह धीरे-धीरे आती है। शुरुआत में असर कम होता जाता है, धीरे-धीरे इंसान ज़्यादा स्थिर होता जाता है। यह एक journey है, instant switch नहीं।
सवाल: मेरा मन बहुत ज़्यादा हिलता है — मैं कहाँ से शुरू करूं?
स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — रोज़ की साधना से शुरू करो। हर दिन का ध्यान एक ईंट है उस "हवा रहित दीवार" की। एक दिन में नहीं बनती, पर रोज़ करने से ज़रूर बनती है।
सवाल: यह दीये की उपमा इतनी famous क्यों है?
प्रभुपाद जी कहते हैं — क्योंकि यह बहुत सरल है, पर बहुत गहरी भी है। हर इंसान ने दीया जलते देखा है। यह image तुरंत समझ आती है — और यही गीता की खूबी है, गहरी बातों को सरल उपमाओं में कहना।
सवाल: क्या मन की यह स्थिरता feeling को खत्म कर देती है?
स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — नहीं। दीया तब भी रोशनी देता है जब वह स्थिर हो — बल्कि उसकी रोशनी और बेहतर होती है। वैसे ही स्थिर मन वाला इंसान feel करता है, पर वह feeling उसे उड़ा नहीं ले जाती।
सवाल: 6.18 और 6.19 मिलकर क्या सिखाते हैं?
6.18 ने बताया — युक्त कौन है, चित्त की क्या स्थिति होती है। 6.19 उसी अवस्था को एक सुंदर उपमा देता है — हवा रहित जगह में जलता दीया। शब्दों के बाद image — दोनों मिलकर उस अवस्था को बहुत स्पष्ट और याद रखने योग्य बना देते हैं।
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🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏