भगवद गीता 6.8 — जिसे ज्ञान और अनुभव दोनों मिल गए, उसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना एक है

Published: 9 जून 2026 भगवद गीता 6.8 — जिसे ज्ञान और अनुभव दोनों मिल गए, उसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना एक है 🇺🇸 Read in English

एक सवाल — क्या आपने कभी किसी ऐसे इंसान को देखा है जो सोने को और मिट्टी को एक नज़र से देखे? जिसे हीरे और पत्थर में कोई फर्क न लगे? पहली नज़र में यह सुनकर लगता है — यह तो पागल होगा, या बेवकूफ। पर जब आप इस श्लोक को समझते हैं — तो पता चलता है कि यह पागलपन नहीं, यह सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।

जो इंसान सोने में और मिट्टी में फर्क नहीं देखता — वह इसलिए नहीं कि उसे सोने की कीमत पता नहीं। वह इसलिए क्योंकि उसकी खुशी, उसकी शांति, उसकी पूर्णता — किसी बाहरी चीज़ पर टिकी नहीं है। न सोने पर, न मिट्टी पर। वह अंदर से इतना भरा हुआ है कि बाहर की कोई भी चीज़ उसे ज़्यादा या कम नहीं करती।

यह श्लोक उस इंसान का description है जिसे कृष्ण युक्त कहते हैं — यानी जो सच में योग में स्थित है। और इस description में कुछ ऐसी बातें हैं जो आज के इंसान के लिए बहुत ज़रूरी हैं।

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।

युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ६.८ ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — जो ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जिसका मन अचल और स्थिर है, जिसकी इंद्रियाँ जीती हुई हैं, और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना समान हैं — वह योगी युक्त कहलाता है।

चार चीज़ें यहाँ हैं। ज्ञानविज्ञानतृप्त — ज्ञान और अनुभव दोनों से तृप्त। कूटस्थ — अचल, जो किसी भी परिस्थिति में हिले नहीं। विजितेन्द्रिय — जिसकी इंद्रियाँ जीती हुई हों। और समलोष्टाश्मकाञ्चन — मिट्टी, पत्थर और सोना जिसके लिए एक समान हों।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर बहुत गहराई से कहते हैं कि ज्ञान और विज्ञान दो अलग चीज़ें हैं। ज्ञान है — शास्त्रों से, गुरु से, सत्संग से जो समझ मिलती है। विज्ञान है — वह अनुभव जो साधना में खुद होता है। जब दोनों मिल जाएं — तो तृप्ति आती है। जब केवल ज्ञान हो पर अनुभव न हो — तो भूख रहती है।

वे कूटस्थ पर कहते हैं — कूट का मतलब है एक ऐसी जगह जो हिलती नहीं। जैसे पहाड़ की चोटी। कूटस्थ वह है जो किसी भी परिस्थिति में — सुख में, दुख में, लाभ में, हानि में — अपनी जगह से नहीं हिलता। यह बाहरी कठोरता नहीं है — यह अंदरूनी स्थिरता है।

समलोष्टाश्मकाञ्चन — मिट्टी, पत्थर, सोना बराबर — पर स्वामी जी कहते हैं कि यह बाहरी चीज़ों की कीमत न जानना नहीं है। इसका मतलब है — इन चीज़ों से अपनी खुशी या दुख को जोड़ना बंद हो गया है। सोना मिले तो ठीक, न मिले तो भी ठीक। यही समभाव है — और यही मुक्ति का एक रूप है।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि ज्ञानविज्ञानतृप्त वह है जो केवल theory नहीं जानता — बल्कि उस theory को जी चुका है। प्रभुपाद जी के अनुसार — भगवान के बारे में पढ़ना ज्ञान है, और भगवान का अनुभव करना विज्ञान। जब दोनों हों — तब कोई और इच्छा नहीं बचती।

वे कूटस्थ पर कहते हैं कि यह शब्द बहुत गहरा है। कूटस्थ वह है जो माया के प्रभाव से ऊपर उठ गया है। जैसे आकाश पर बादल आते-जाते हैं पर आकाश हिलता नहीं — वैसे ही कूटस्थ इंसान पर परिस्थितियाँ आती-जाती हैं पर वह हिलता नहीं।

प्रभुपाद जी समलोष्टाश्मकाञ्चन पर कहते हैं कि यह भक्त की सबसे बड़ी पहचानों में से एक है। जो भक्त कृष्ण में पूरी तरह स्थित है — उसके लिए सोने और मिट्टी में व्यावहारिक फर्क तो होता है, पर भावनात्मक फर्क नहीं। वह सोने के लिए उतना ही शांत है जितना मिट्टी के लिए।

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज की materialistic दुनिया से जोड़ते हैं। वे कहते हैं — आज पूरी दुनिया सोने के पीछे दौड़ रही है। पैसा, status, luxury — यह सब आज के "सोने" हैं। और जो इन्हें नहीं पाता वह दुखी है, जो पाता है वह और माँगता है। यह एक ऐसी दौड़ है जिसका अंत नहीं।

वे कहते हैं — समलोष्टाश्मकाञ्चन का मतलब यह नहीं कि पैसा कमाना बंद कर दो। मतलब यह है कि पैसे से अपनी identity मत जोड़ो। जब पैसा हो तो शांत रहो, जब न हो तो भी शांत रहो। यह freedom है — और यह freedom आज के इंसान को सबसे ज़्यादा चाहिए।

स्वामी जी ज्ञानविज्ञान पर एक बहुत practical बात कहते हैं — वे कहते हैं कि केवल किताबें पढ़ने से तृप्ति नहीं आती। जब आप गीता पढ़ते हैं और फिर उसे जीवन में उतारते हैं — जब आप किसी परिस्थिति में वह ज्ञान काम आते देखते हैं — तब विज्ञान होता है। और तभी असली तृप्ति आती है।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

सोचिए एक businessman को जिसका बहुत बड़ा नुकसान हो गया। करोड़ों डूब गए। पर वह अगले दिन उठा, नाश्ता किया, परिवार के साथ बैठा, और फिर काम पर निकल गया — बिना किसी बड़ी उथल-पुथल के। यह है समलोष्टाश्मकाञ्चन — सोने और मिट्टी में समभाव।

या सोचिए एक साधक को जो बरसों से गीता पढ़ रहा है — और एक दिन ज़िंदगी की किसी मुश्किल में वह ज्ञान काम आया। उसने देखा कि "हाँ, यही तो गीता कह रही थी।" उस पल उसे जो शांति मिली — वह है विज्ञान। ज्ञान का अनुभव में बदलना।

और कूटस्थ — रोज़ की ज़िंदगी में इसका मतलब है — जब office में बहुत tension हो और आप घर आकर भी उसी tension में डूबे न रहें। जब बच्चे परेशान करें और आप शांत रहें। जब खुशखबरी आए और आप excited होकर पागल न हो जाएं। यह सब उस अचल स्थिरता के छोटे-छोटे रूप हैं।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: ज्ञान और विज्ञान में क्या फर्क है — दोनों एक ही नहीं हैं?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — ज्ञान है सुनी और पढ़ी हुई बात। विज्ञान है खुद जी हुई बात। जैसे आग के बारे में पढ़ना ज्ञान है, और आग को छूकर उसकी गर्मी महसूस करना विज्ञान। दोनों ज़रूरी हैं — एक दूसरे के बिना अधूरे हैं।

सवाल: सोना और मिट्टी बराबर — क्या यह practically सम्भव है?

प्रभुपाद जी कहते हैं — practical level पर सोने और मिट्टी में फर्क हमेशा रहेगा। पर emotional और spiritual level पर — जब सोने की चाहत और मिट्टी की उपेक्षा दोनों चली जाएं — तब यह सम्भव है। यह बाहरी व्यवहार नहीं — अंदरूनी भाव है।

सवाल: कूटस्थ होना — क्या यह जड़ता नहीं है?

स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — बिल्कुल नहीं। कूटस्थ इंसान सबसे ज़्यादा active और present होता है। जड़ता वह है जब मन सुस्त हो। कूटस्थता वह है जब मन हिले ज़रूर नहीं — पर पूरी तरह जागरूक और सक्रिय हो।

सवाल: युक्त योगी बनने में कितना समय लगता है?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — यह समय की बात नहीं, निष्ठा की बात है। जो रोज़ थोड़ा-थोड़ा साधना करता है — ज्ञान लेता है, उसे जीवन में उतारता है — वह धीरे-धीरे इस अवस्था की तरफ बढ़ता है।

सवाल: 6.7 और 6.8 मिलकर क्या सिखाते हैं?

6.7 ने बताया — जीते हुए मन वाले के लिए सर्दी-गर्मी, मान-अपमान सब एक है। 6.8 उसी description को आगे ले जाता है — ज्ञान और अनुभव से तृप्त, अचल, इंद्रियजित, और सोना-मिट्टी एक मानने वाला — यही युक्त योगी है। दोनों मिलकर उस इंसान की पूरी तस्वीर बनाते हैं जो सच में योग में स्थित है।

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https://krishnbhakti.com/hindi-blogs/gita-shloka-6-7-jite-mann-wala-insaan-kaisa-hota-hai

🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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