पिछले श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने बताया था कि बहुत जन्मों के अंत में कोई ज्ञानी व्यक्ति 'वासुदेव सर्वमिति' के भाव को प्राप्त होता है। लेकिन अब, यहाँ सातवें अध्याय के बीसवें श्लोक में, कृष्ण एक बहुत ही कड़वी मगर सच्ची हकीकत सामने रखते हैं। वे बताते हैं कि कैसे लोग अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं के लिए भटकाव में रहते हैं।
हम सभी के जीवन में कोई न कोई ऐसा दौर जरूर आता है जब हम बहुत हताश होते हैं। ऑफिस का प्रेशर, ब्रेकअप का दर्द, करियर की अनिश्चितता या घर की उलझनें—इन सबके बीच हम अक्सर मंदिर जाते हैं, प्रार्थना करते हैं, मन्नतें मांगते हैं। लेकिन कई बार, हमें वो नहीं मिलता जो हम चाहते हैं। तब मन में एक सवाल आता है—क्या भगवान मेरी नहीं सुन रहे? क्या मेरे कर्म कम पड़ गए?
अक्सर लोग एक बहुत बड़ी गलतफहमी पाल लेते हैं। हमें लगता है कि अगर हम किसी भी शक्ति के सामने झुक जाएं, तो वह 'फल' देने के लिए बाध्य है। हम बाजार की तरह धर्म को देखते हैं—एक सिक्का (प्रार्थना) डाला, और दूसरी तरफ से सामान (इच्छा पूर्ति) निकल आना चाहिए। लेकिन कृष्ण यहाँ हमें आईना दिखाते हैं।
वे कहते हैं कि लोग अपनी इच्छाओं के जाल में इतने फंस जाते हैं कि वे भूल जाते हैं कि असली फल देने वाला कौन है। जब हम अपनी इच्छाओं के पीछे भागते हैं, तो हमारा विवेक धुंधला हो जाता है। हम उस परम सत्य को छोड़कर अस्थायी सुखों की तलाश में भटकने लगते हैं। आज के सोशल मीडिया के युग में, जहाँ हमें हर चीज़ 'इंस्टेंट' चाहिए, यह श्लोक हमें धैर्य और सही दिशा के बारे में सोचने पर मजबूर करता है।
क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप किसी शॉर्टकट की तलाश में होते हैं, तो क्या आप वास्तव में अपनी भलाई चाह रहे हैं या सिर्फ उस क्षणिक तनाव से बचना चाह रहे हैं? कृष्ण का यह श्लोक हमें सिखाता है कि इच्छाओं की प्रकृति ही ऐसी है कि वे हमें भगवान से दूर ले जाती हैं।
युवावस्था में, हमारे पास ऊर्जा बहुत है, लेकिन दिशा का अभाव है। हम अक्सर अपने करियर या रिश्तों को सुधारने के लिए उन चीजों के पीछे दौड़ते हैं जो हमें अंततः खोखला बना देती हैं। कृष्ण यहाँ एक चेतावनी और एक समाधान—दोनों दे रहे हैं।
आइये, इस श्लोक की गहराई में उतरते हैं और समझते हैं कि कैसे हम अपनी प्रार्थनाओं को स्वार्थ से हटाकर आत्म-कल्याण की ओर ले जा सकते हैं। यह श्लोक सिर्फ एक ज्ञान की बात नहीं, बल्कि आपके पूरे जीवन जीने के नजरिए को बदलने वाली चाबी है।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ ७.२० ॥
सरल अर्थ:
यहाँ कृष्ण कहते हैं: 'कामैस्तैस्तैः'—अपनी उन-उन सांसारिक इच्छाओं द्वारा, 'हृतज्ञानाः'—जिनका ज्ञान (विवेक) हर लिया गया है, 'प्रपद्यन्ते'—वे लोग शरण लेते हैं, 'अन्यदेवताः'—अन्य देवताओं की। 'तं तं नियममास्थाय'—अपनी उन-उन स्वभावजन्य नियमों का पालन करते हुए, 'प्रकृत्या नियताः स्वया'—वे अपनी प्रकृति (संस्कारों) से विवश होकर ऐसा करते हैं।
इसका सार यह है कि लोग अपनी अतृप्त इच्छाओं के कारण अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं। वे अपनी पुरानी आदतों और संस्कारों के वश में होकर अलग-अलग शक्तियों की पूजा करते हैं, यह भूलकर कि सब कुछ उसी एक परम शक्ति से आता है।
की-टेकअवेज: 1. इच्छाएं बुद्धि को हर लेती हैं। 2. लोग अपनी प्रकृति और आदतों के अनुसार भगवान को ढूंढते हैं। 3. असली ज्ञान यह है कि सब कुछ एक ही परमात्मा से मिलता है।
स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि
स्वामी जी कहते हैं कि यहाँ 'हृतज्ञानाः' शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। जब व्यक्ति के मन में कोई तीव्र इच्छा जागृत होती है, तो उसका विवेक मर जाता है। वह यह भूल जाता है कि जो वस्तु उसे चाहिए, उसकी असली प्राप्ति का स्रोत क्या है।
स्वामी जी समझाते हैं कि 'अन्यदेवता' का अर्थ यहाँ केवल बाहरी देवी-देवता नहीं हैं, बल्कि वे सभी सांसारिक साधन और व्यक्ति हैं जिन्हें हम अपनी खुशी का आधार मान लेते हैं। हम पैसे को भगवान मान लेते हैं, हम किसी पद को भगवान मान लेते हैं, हम किसी व्यक्ति को भगवान मान लेते हैं।
स्वामी जी का मानना है कि मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार, जैसे उसके पिछले संस्कार हैं, वैसे ही देवताओं की शरण में जाता है। यदि उसके संस्कार तामसिक हैं, तो वह वैसी ही शक्तियों के पीछे भागेगा। लेकिन यह सब 'अस्थायी' है।
वे जोर देकर कहते हैं कि 'नियममास्थाय' का अर्थ है कि हम अपनी इच्छाओं के अनुसार एक ढांचा बना लेते हैं और उसी में उलझ जाते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि असली मुक्ति तब है जब हम अपनी इच्छाओं को ही भगवान के चरणों में समर्पित कर दें।
प्रभुपाद जी की भक्तिमयी व्याख्या
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद जी इसे एक 'भक्ति' के चश्मे से देखते हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण यहाँ बहुत दयालुता से समझा रहे हैं कि कैसे जीव भटक रहा है। प्रभुपाद जी कहते हैं कि जो लोग कृष्ण को नहीं जानते, वे अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए देवताओं के पास जाते हैं, जबकि वे देवता भी कृष्ण के ही अधीन हैं।
प्रभुपाद जी का कहना है कि यह एक 'अल्पमेधसाम' (कम बुद्धि वाले) लोगों का लक्षण है। वे कहते हैं कि यदि आप सीधे सूर्य के पास जा सकते हैं, तो आप मोमबत्ती के पास क्यों जा रहे हैं? कृष्ण ही असली दाता हैं, और देवताओं के माध्यम से भी जो मिलता है, वह भी कृष्ण की ही अनुमति से मिलता है।
उनकी व्याख्या में, वे इस बात पर जोर देते हैं कि हमें अपनी प्रार्थनाओं को 'शुद्ध' करना चाहिए। हमें कृष्ण से यह नहीं मांगना चाहिए कि 'मुझे ये दे दो', बल्कि हमें यह कहना चाहिए कि 'आप मुझे जो दें, मैं उसे आपकी सेवा में लगाऊं'—यही भक्ति है।
स्वामी मुकुंदानंद जी का आधुनिक नजरिया
स्वामी मुकुंदानंद जी इस श्लोक को आज के 'स्ट्रेस' से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि हमारी इच्छाएं एक 'सॉफ्टवेयर' की तरह हैं जो हमारे दिमाग को कंट्रोल करती हैं। जब हम किसी चीज के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक होते हैं, तो हमारा 'सॉफ्टवेयर' हैंग हो जाता है।
वे एक बहुत अच्छा उदाहरण देते हैं—जैसे एक बच्चा खिलौने के लिए रोता है और उसे लगता है कि खिलौना ही दुनिया है। वैसे ही, एक प्रोफेशनल को लगता है कि 'प्रमोशन' ही उसकी खुशी है। जब वह नहीं मिलता, तो वह दुखी हो जाता है।
मुकुंदानंद जी कहते हैं कि कृष्ण यहाँ यह नहीं कह रहे कि पूजा करना गलत है। वे कह रहे हैं कि 'इच्छा के साथ' पूजा करना गलत है। जब आप इच्छा के साथ प्रार्थना करते हैं, तो वह 'व्यापार' बन जाता है, 'भक्ति' नहीं।
वे युवाओं को समझाते हैं कि अपनी इच्छाओं को 'मैनेज' करना सीखें। अगर आप अपनी इच्छाओं को नियंत्रित नहीं करेंगे, तो आपकी इच्छाएं आपको नियंत्रित करेंगी। यही है 'प्रकृत्या नियताः स्वया' का असली मतलब—हम अपने संस्कारों के दास बन चुके हैं।
वास्तविक जीवन के उदाहरण
कल्पना करें, एक युवा छात्र 'राहुल' है। वह बहुत परेशान है क्योंकि उसका कॉलेज का सिलेक्शन नहीं हो रहा। वह हर मंदिर जाता है, हर गुरु के पास जाता है, मन्नतें मांगता है। वह पूरी तरह से अपनी इच्छा में खोया हुआ है (हृतज्ञानाः)। उसका पूरा ध्यान सिर्फ रिजल्ट पर है, अपनी मेहनत और सीखने पर नहीं।
अचानक उसे गीता का यह श्लोक मिलता है। उसे समझ आता है कि वह भगवान को अपना 'असिस्टेंट' समझ रहा है। वह अपनी प्रार्थना को बदलता है। वह कहता है—'प्रभु, जो मेरे लिए सही है, मुझे वो सामर्थ्य दें'। धीरे-धीरे उसका मानसिक तनाव कम होने लगता है क्योंकि उसने 'फल' की चिंता छोड़ दी है।
एक और उदाहरण: ऑफिस में आपको लगता है कि आपका बॉस आपकी तारीफ करेगा तो आप खुश होंगे। आप हर संभव प्रयास करते हैं। जब वह तारीफ नहीं करता, तो आप डिप्रेशन में चले जाते हैं। यह आपकी इच्छा है जिसने आपका ज्ञान हर लिया है।
स्वामी मुकुंदानंद जी के अनुसार, आपको 'वापस आना' होगा। जब भी मन किसी इच्छा में भागे, उसे वापस लाएं और कहें—'मैं अपना कर्म करूँगा, फल कृष्ण पर छोड़ूँगा'। यह एक निरंतर अभ्यास (practice) है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Q&A)
Q1: क्या पूजा करना गलत है?
नहीं, स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं कि पूजा करना गलत नहीं है, लेकिन अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए भगवान को इस्तेमाल करना गलत है। पूजा का उद्देश्य खुद को शुद्ध करना होना चाहिए, न कि दुनियावी चीजें हासिल करना।
Q2: मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरी इच्छा 'हृतज्ञाना' है?
मुकुंदानंद जी कहते हैं कि अगर वह इच्छा पूरी न होने पर आप बहुत ज्यादा दुखी हो जाते हैं, तो समझो वह आपकी 'हृतज्ञाना' (बुद्धि हरने वाली) इच्छा है।
Q3: कृष्ण को सीधे कैसे मांगें?
प्रभुपाद जी सिखाते हैं कि अपनी सेवा भाव को बढ़ाएं। जो मांगना है, वह कृष्ण से अपनी भक्ति मांगे, बाकी चीजें तो वे खुद ही संभाल लेंगे जो आपके लिए उचित हैं।
Q4: क्या यह श्लोक अन्य देवताओं की निंदा करता है?
नहीं, यह उनकी निंदा नहीं करता। यह केवल मनुष्य की उस 'मानसिकता' की बात कर रहा है जो सिर्फ 'स्वार्थ' के लिए कहीं भी झुक जाती है।
Q5: क्या मेरा भगवान पर भरोसा कम हो रहा है?
बिल्कुल नहीं। यह श्लोक आपको और करीब लाएगा क्योंकि अब आप 'लेन-देन' के बजाय 'प्रेम' से जुड़ेंगे।
🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏
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