क्या भगवान का कोई रूप नहीं है? भ्रम और हकीकत की सच्चाई
पिछले श्लोक में भगवान ने उन लोगों की बात की थी जो अल्प बुद्धि वाले होते हैं और क्षणभंगुर फलों की चाह में देवताओं की पूजा करते हैं। आज हम 7.24 श्लोक पर चर्चा करेंगे, जो हमारे जीवन के एक सबसे बड़े 'भ्रम' को तोड़ता है। अक्सर हम सुनते हैं कि 'भगवान का कोई रूप नहीं है, वे तो बस एक रोशनी हैं, एक ऊर्जा हैं।' सोशल मीडिया हो या हमारे आस-पास के तथाकथित बुद्धिजीवी, हर कोई इसी बात को बढ़ावा देता है।
लेकिन क्या यह सच है? क्या असीम प्रेम के सागर भगवान, जो अर्जुन के सारथी बनकर लड़ाई के मैदान में खड़े थे, बस एक 'एनर्जी' हैं? या फिर यह हमारी अपनी सीमित समझ है जो हमें उनके दिव्य रूप को देखने से रोकती है? आज के युवा अक्सर इस बात में उलझे रहते हैं कि क्या भक्ति का मतलब किसी मूर्ति के सामने झुकना है, या फिर बस अपनी कल्पना में किसी निराकार सत्ता को याद करना है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब हम ऑफिस के टारगेट, सोशल मीडिया की तुलना और रिश्तों के तनाव से घिरे होते हैं, तो हमें एक ऐसे साथी की तलाश होती है जिससे हम बात कर सकें, जिसे हम गले लगा सकें। एक 'एनर्जी' या 'ब्रह्मांडीय शक्ति' को गले लगाना मुश्किल है। भगवान कृष्ण यहाँ बहुत स्पष्ट और थोड़ी कठोर बात कह रहे हैं, जो हमें झकझोर कर रख देगी।
वह कहते हैं कि जो लोग मुझे केवल एक साधारण मनुष्य या केवल एक निराकार शक्ति मानते हैं, वे मेरी उस परम स्थिति को नहीं जानते जो नित्य और दिव्य है। वे मेरी उस सर्वोच्च शक्ति को नहीं देख पाते जो 'अव्यय' है, कभी खत्म न होने वाली है।
यह श्लोक हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें 'आध्यात्मिक अहंकार' से बचाता है। बहुत से लोग सोचते हैं कि वे बहुत ऊंचे स्तर पर पहुँच गए हैं जहाँ उन्हें किसी मूर्ति या किसी स्वरूप की ज़रूरत नहीं। वे खुद को 'साकार' रूप की पूजा से ऊपर मान लेते हैं। लेकिन क्या वाकई हम उस ऊँचाई पर हैं? या बस हमने अपनी सुविधा के अनुसार भगवान को एक परिभाषा में बांध लिया है?
आइए, आज इस श्लोक की गहराइयों में चलते हैं और देखते हैं कि भगवान कृष्ण हमारे लिए क्या संदेश लेकर आए हैं। यह केवल एक शास्त्र का पाठ नहीं है, यह हमारे सोचने के तरीके को बदलने का एक अवसर है।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ ७.२४ ॥
सरल अर्थ:
अव्यक्तं (निराकार, अप्रकट) व्यक्तिम् आपन्नं (व्यक्ति के रूप में, साकार रूप में) मन्यन्ते (मानते हैं) माम् (मुझको) अबुद्धयः (अल्पबुद्धि वाले)। परं भावम् (मेरी परम स्थिति को) अजानन्तः (नहीं जानते हुए) मम (मेरे) अव्ययम् (अविनाशी) अनुत्तमम् (सर्वोत्तम स्वरूप को)।
इसका सरल अर्थ है: जो अल्प बुद्धि वाले हैं, वे मेरे उस परम, अविनाशी और सर्वोत्तम स्वरूप को नहीं जानते, जो वास्तव में निराकार होते हुए भी भक्तों की कृपा के लिए साकार रूप धारण करता है। वे सोचते हैं कि मैं केवल एक साधारण मनुष्य के रूप में इस धरती पर आया हूँ।
स्वामी रामसुखदास जी महाराज कहते हैं कि भगवान का 'अव्यक्त' रूप भी वही है और 'व्यक्त' रूप भी वही है। समस्या रूप में नहीं, हमारी बुद्धि की संकीर्णता में है। वे 'अव्यय' शब्द पर जोर देते हैं—वह स्वरूप जो कभी व्यय नहीं होता, जो कभी कम नहीं होता। जब भगवान अवतार लेते हैं, तो वे अपनी योगमाया से ढके रहते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि भगवान की माया इतनी प्रबल है कि वह बुद्धिमानों की बुद्धि भी हर लेती है।
प्रभुपाद जी के अनुसार, यहाँ 'अबुद्धयः' का अर्थ है वे लोग जिनकी आध्यात्मिक दृष्टि खुलती नहीं है। वे कृष्ण को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व मानते हैं, वे उनकी दिव्यता को नहीं पहचान पाते। भक्त के लिए कृष्ण का रूप ही सब कुछ है। वे इसे बड़े सुंदर तरीके से समझाते हैं कि कैसे कृष्ण अपनी अंतरंगा शक्ति के माध्यम से भक्तों के लिए प्रकट होते हैं।
स्वामी मुकुंदानंद जी इस श्लोक को आधुनिक जीवन से जोड़ते हुए कहते हैं कि हम अक्सर भगवान को 'डिब्बे' में बंद कर देते हैं। या तो हम उन्हें फोटो मान लेते हैं, या केवल एक निराकार विचार। लेकिन भगवान अनंत हैं—वे निराकार भी हैं और साकार भी। उनका साकार रूप, निराकार से भी बड़ा है क्योंकि प्रेम साकार रूप में ही व्यक्त हो सकता है।
जीवन के उदाहरण: मान लीजिए आप एक कंपनी में काम कर रहे हैं। आपके बॉस का एक रूप है जो सब देखते हैं—गुस्सैल, व्यस्त। लेकिन जो उनका करीबी है, वह उनका दूसरा रूप भी जानता है—दयालु, मार्गदर्शक। इसी तरह, जो भगवान का भक्त है, वह उनके 'साकार' स्वरूप में ही उनके विराट 'निराकार' वैभव को देख लेता है। यह ज्ञान का नहीं, प्रेम का विषय है।
प्र: क्या निराकार की पूजा करना गलत है? स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं कि नहीं, गलत नहीं है, लेकिन अपूर्ण है। जब तक आप 'भाव' से नहीं जुड़ते, तब तक कोई भी रूप हो, वह व्यर्थ है।
🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏
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