क्या आपको कभी लगा है कि आप एक ऐसी जगह खड़े हैं जहाँ से पीछे हटना मुमकिन नहीं?
शायद वह आपके ऑफिस का कोई बड़ा प्रोजेक्ट है, कोई टूटा हुआ रिश्ता है, या फिर वह अंदरूनी लड़ाई जो आप रोज खुद से लड़ते हैं। सब कुछ तैयार है, लोग देख रहे हैं, और आपको अब फैसला लेना ही होगा। धृतराष्ट्र भी बिल्कुल इसी स्थिति में थे। उनके सामने उनका अपना ही 'कुरुक्षेत्र' था।
क्या है यह समस्या?
धृतराष्ट्र जानते थे कि वे गलत हैं। उन्होंने अपने बेटों के लालच को बढ़ावा दिया था। वे जानते थे कि युद्ध का अंत विनाश होगा, फिर भी उन्होंने संजय से पूछा, 'मेरे बेटों ने क्या किया?' यह सवाल सिर्फ बाहरी युद्ध के बारे में नहीं था। यह उस डर, उस लगाव और उस असुरक्षा का सवाल था जो हम सभी महसूस करते हैं जब हम अपनी गलतियों के परिणामों का सामना करने के लिए तैयार नहीं होते।
धृतराष्ट्र उवाच: धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ||
धृतराष्ट्र ने पूछा: हे संजय, धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्रित मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
तीन शिक्षक, एक श्लोक
स्वामी मुकुंदानंद जी
स्वामी जी कहते हैं कि धृतराष्ट्र का प्रश्न उनकी मानसिक स्थिति को दर्शाता है। 'मेरे' (मामकाः) और 'पांडव' के बीच का भेद ही सारी अशांति की जड़ है। जब हम जीवन में 'मैं' और 'मेरा' के चश्मे से चीजों को देखते हैं, तो हम कभी शांति नहीं पा सकते।
श्रील प्रभुपाद
प्रभुपाद जी इसे एक आध्यात्मिक दृष्टि से देखते हैं। कुरुक्षेत्र केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं है, यह हमारा शरीर है जो 'धर्मक्षेत्र' है। यहाँ हर पल अच्छे (पांडव) और बुरे (कौरव) विचारों का युद्ध चल रहा है।
स्वामी रामसुखदास जी
स्वामी जी समझाते हैं कि 'धर्मक्षेत्र' शब्द का अर्थ है जहाँ धर्म की प्रधानता हो। धृतराष्ट्र भी जानते थे कि कुरुक्षेत्र एक पवित्र स्थान है, जहाँ अधर्म का परिणाम बुरा ही होगा। वे अपनी चेतना में इस सत्य को जानते हुए भी अपने मोह से बंधे थे।
आधुनिक जीवन में इसका अर्थ
सोचिए, आप एक मीटिंग में बैठे हैं। आपको पता है कि टीम का कोई सदस्य गलत है, लेकिन आप अपनी कुर्सी बचाने के लिए चुप हैं। यह आपका कुरुक्षेत्र है। धृतराष्ट्र का सवाल आज के हर उस इंसान का सवाल है जो सच जानता है, लेकिन अपनी आदतों या मोह के कारण उसे स्वीकार नहीं कर पा रहा।
क्या हमें कृष्ण से पूछना चाहिए?
क्या इसका मतलब यह है कि हम अपनी समस्याओं के लिए दूसरों से पूछते रहें? नहीं। इसका मतलब यह है कि हमें अपने भीतर के 'संजय' को जगाना होगा—वह विवेक जो हमें सच्चाई दिखाता है। जब आप पूछते हैं, 'अब क्या होगा?', तो समझ लीजिए कि आप भी धृतराष्ट्र की तरह परिणाम से डरे हुए हैं। कृष्ण कहते हैं, परिणाम की चिंता छोड़ो, अपने धर्म पर ध्यान दो।
जीवन में डर तभी खत्म होता है जब हम अपने मोह को छोड़कर सच को स्वीकार कर लेते हैं। आप आज किस युद्ध के बीच खड़े हैं?
एक विचार: क्या आप आज खुद से पूछ सकते हैं कि 'क्या मैं सही के साथ खड़ा हूँ या सिर्फ 'मेरे' होने के अहसास के साथ?'