क्या आप भी अपनी असुरक्षाओं की लिस्ट बना रहे हैं?
कभी गौर किया है? जब हम किसी बात को लेकर अंदर से डरे हुए होते हैं, तो दुनिया की हर छोटी चीज़ हमें एक बड़ी चुनौती लगने लगती है। ऑफिस का वो सहकर्मी जो शायद हमारे बारे में कुछ नहीं सोचता, हमें एक 'खतरा' लगने लगता है। घर में जो छोटी सी बात है, वो पहाड़ जैसी बड़ी दिखने लगती है। हम बैठते हैं और मन ही मन अपनी असुरक्षाओं की एक पूरी लिस्ट तैयार करने लगते हैं - 'वो तो बहुत होशियार है, उसके पास तो बहुत सपोर्ट है, वो तो मुझसे कहीं बेहतर है।'
यह कहानी दुर्योधन की है। कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़ा दुर्योधन, जो खुद राजा है, अपनी सेना का नेतृत्व कर रहा है, लेकिन अंदर से वो कांप रहा है। उसे सामने की सेना में केवल 'खतरे' दिखाई दे रहे हैं।
श्लोक
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ॥ ६ ॥
सरल अर्थ: दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य को पाण्डवों की सेना के वीर योद्धाओं के बारे में गिनवा रहा है। वो अभिमन्यु और द्रौपदी के पुत्रों की वीरता का बखान कर रहा है, जैसे वो मन ही मन अपनी हार को पहले ही देख चुका हो।
तीन शिक्षक, एक श्लोक
स्वामी मुकुंदानंद जी: मन जब असुरक्षित होता है, तो वह दूसरों की खूबियों को बढ़ा-चढ़ाकर देखने लगता है। दुर्योधन की यह सूची उसकी अपनी घबराहट का परिणाम है। हम भी अक्सर अपनी कमियों को छिपाने के लिए दूसरों की 'ताकत' को बहुत बड़ा बना देते हैं।
श्रील प्रभुपाद: दुर्योधन के मन में कृष्ण नहीं हैं, इसलिए उसे केवल शत्रु दिखाई दे रहे हैं। जब हम भगवान के शरणागत होते हैं, तो डर खत्म हो जाता है। लेकिन दुर्योधन अपनी बुद्धि से सबको आंक रहा है, इसीलिए वह अंत तक भयभीत ही रहता है।
स्वामी रामसुखदास जी: यह श्लोक दिखाता है कि कैसे एक डरा हुआ इंसान अपनी ही हार की भूमिका पहले से तैयार कर लेता है। दुर्योधन द्रोणाचार्य को डराने की कोशिश कर रहा है क्योंकि वो खुद डर गया है।
आधुनिक जीवन और हम
क्या आप भी कभी-कभी अपनी असफलताओं का पहले ही 'इमेजिनेशन' करने लगते हैं? जैसे किसी इंटरव्यू से पहले या किसी कठिन बातचीत से पहले, हम सामने वाले को 'बहुत शक्तिशाली' मान लेते हैं। हम सोचने लगते हैं कि 'सामने वाला तो बहुत काबिल है, मैं कैसे टिक पाऊंगा?' यह दुर्योधन वाली मानसिकता है - अपनी कमियों पर ध्यान देने के बजाय दूसरों के 'महारथी' होने की लिस्ट बनाना।
क्या इसका मतलब यह है कि...
क्या हमें दूसरों की काबिलियत को कम आंकना चाहिए? बिल्कुल नहीं। दुर्योधन की गलती यह नहीं थी कि उसने दूसरों को वीर कहा, उसकी गलती यह थी कि उसने उस वीरत्व को 'डर' के चश्मे से देखा। आप दूसरों का सम्मान करें, लेकिन उनसे डरें नहीं। डरना ही हार की पहली सीढ़ी है।
याद रखिए, आप अपनी ऊर्जा को दूसरों के गुण गिनने में लगा रहे हैं या अपनी तैयारी पर? जब हम असुरक्षित होते हैं, तो हम दूसरों का आकलन करते हैं। जब हम आत्मविश्वासी होते हैं, तो हम अपना काम करते हैं।
आज आप अपने मन में जो 'लिस्ट' बना रहे हैं, क्या वो डर की है या भरोसे की?