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भीड़ में भी अकेलेपन से क्यों डरते हैं आप?

क्या आप हमेशा दूसरों से तारीफ या साथ की उम्मीद रखते हैं? जानिए कैसे खुद के साथ खुश रहना सीखें।

📖 भगवद गीता अध्याय 6.20 02 July 2026
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यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।
— भगवद गीता 6.20

क्या आपको भी हर वक्त किसी के साथ की ज़रूरत महसूस होती है?

सोचिए, एक लंबा हफ्ता बीता है। ऑफिस का तनाव, घर की उम्मीदें, सोशल मीडिया पर दूसरों की चमक-धमक वाली ज़िंदगी। सप्ताहांत (weekend) आता है, तो क्या आप वाकई सुकून में होते हैं? या फिर आप फोन स्क्रॉल करते रहते हैं, किसी का मैसेज या कॉल का इंतज़ार करते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि 'अकेले' रहना आपको भारी लगता है?

हम अक्सर अपनी खुशी की चाबी दूसरों की जेब में रख देते हैं। हमें लगता है कि अगर कोई हमारी तारीफ करे, कोई हमें समझे, या कोई हमारे साथ बैठा रहे, तभी हम ठीक महसूस करेंगे। लेकिन क्या होगा अगर आप खुद ही अपनी कंपनी का आनंद लेने लगें?

वो पल जब मन रुक जाता है

अर्जुन भी बिल्कुल आपकी तरह परेशान थे। उन्हें भी चारों तरफ शोर और उलझन दिख रही थी। तब कृष्ण ने उन्हें उस स्थिति के बारे में बताया जिसे हम 'योग' कहते हैं।

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति।।

इसका सरल अर्थ है: जब अभ्यास करते-करते मन भटकना बंद कर देता है, और आप अपने अंदर ही उस शांति को पा लेते हैं जिसे आप बाहर ढूंढ रहे थे, तो आपको दुनिया की भीड़ में भी अकेलेपन का डर नहीं सताएगा।

तीन नज़रिया, एक गहराई

स्वामी मुकुंदानंद जी:

वे कहते हैं कि हमारा मन एक बंदर की तरह है जो हमेशा एक डाल से दूसरी डाल पर कूदता रहता है। हम शांति बाहर ढूंढते हैं, जबकि असली सुकून मन को काबू करने में है। जब आप अपनी भावनाओं के मालिक बन जाते हैं, तो बाहरी परिस्थितियाँ आपको हिला नहीं पातीं।

श्रील प्रभुपाद जी:

प्रभुपाद जी के अनुसार, यह संतुष्टि तब आती है जब हम अपनी आत्मा को परमात्मा से जोड़ते हैं। जब आप यह समझ जाते हैं कि आपका असली रिश्ता भगवान के साथ है, तो दुनिया की अपेक्षाएं खुद-ब-खुद कम हो जाती हैं।

स्वामी रामसुखदास जी:

उनका कहना है कि हम 'स्वयं' में ही संतुष्ट हो सकते हैं क्योंकि आत्मा कभी दुखी नहीं होती। दुख तो मन की कल्पना है। जब आप अपनी पहचान शरीर से हटाकर आत्मा पर लाते हैं, तो आपको किसी बाहरी सहारे की ज़रूरत नहीं रहती।

ज़िंदगी की भागदौड़ में इसे कैसे अपनाएं?

इसे किसी पहाड़ पर जाकर नहीं, बल्कि अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में आज़माएं।

क्या इसका मतलब दुनिया छोड़ देना है? बिल्कुल नहीं। कृष्ण हमें सन्यासी नहीं, बल्कि 'सचेत' (mindful) इंसान बनाना चाहते हैं। आप काम भी करेंगे, रिश्तों में भी रहेंगे, लेकिन अंदर से आप शांत रहेंगे।

क्या आप आज अपने साथ 10 मिनट बिताने की हिम्मत जुटा सकते हैं? बिना किसी फोन के, बिना किसी विचार के?

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