क्या भगवान को जानना सचमुच संभव है? 7.1 से शुरू करें अपनी असली यात्रा 🚩

प्रकाशित: 26 जुलाई 2026 क्या भगवान को जानना सचमुच संभव है? 7.1 से शुरू करें अपनी असली यात्रा 🚩 Read in English

क्या भगवान को जानना सचमुच संभव है?

अक्सर हम जीवन की भागदौड़ में इतने खो जाते हैं कि हमें यह भी याद नहीं रहता कि हम कहाँ जा रहे हैं। पिछले छठे अध्याय में भगवान कृष्ण ने ध्यान की पराकाष्ठा बताई थी, जहाँ योगी अपने मन को पूरी तरह वश में कर लेता है। लेकिन अब, सातवें अध्याय में, श्री कृष्ण एक नया द्वार खोल रहे हैं। बहुत से लोग सोचते हैं कि भगवान को जानना मतलब सिर्फ उनकी कहानियाँ पढ़ लेना या मंदिर के दर्शन कर लेना है। वे सोचते हैं कि आध्यात्मिकता का अर्थ है दुनिया को छोड़कर भाग जाना। यह एक ऐसी गलतफहमी है जो हमें हमारे वास्तविक लक्ष्य से दूर रखती है।

आप आज की दुनिया में देखिए—ऑफिस का तनाव, करियर की चिंता, सोशल मीडिया पर खुद को दूसरों से बेहतर दिखाने की होड़। इन सब के बीच, क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि कुछ खाली है? जैसे सब कुछ पाने के बाद भी कुछ कमी रह गई हो? यह खालीपन इसलिए है क्योंकि हम उस मूल स्रोत को नहीं जानते जहाँ से सब कुछ निकला है। कृष्ण आज सातवें अध्याय की शुरुआत में हमें एक ऐसे ज्ञान की ओर ले जा रहे हैं जो केवल किताबी नहीं है, बल्कि अनुभव करने योग्य है।

ध्यान से देखिए, पिछले अध्याय में कृष्ण ने 'योगी' के लक्षणों की बात की थी। अब वे 'ज्ञान-विज्ञान' योग की बात कर रहे हैं। यहाँ से कृष्ण का लहजा थोड़ा बदलता है। वे अब आपको एक 'योग' नहीं सिखा रहे, बल्कि अपना 'परिचय' दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि 'मुझे जानो'। लेकिन सवाल यह है कि क्या अनंत को सीमित बुद्धि से जाना जा सकता है? लोग अक्सर हार मान लेते हैं कि भगवान को जानना तो केवल संतों का काम है, हम तो सांसारिक लोग हैं। लेकिन कृष्ण कहते हैं—नहीं! तुम भी जान सकते हो, बशर्ते तुम मुझे सही तरीके से सुनो।

हम अपने दैनिक जीवन में छोटी-छोटी चीजों को जानने की कोशिश करते हैं—शेयर मार्केट, नई तकनीक, दूसरे लोग क्या सोच रहे हैं। लेकिन क्या हमने कभी उस शक्ति को जानने की कोशिश की जो हमारी हर धड़कन के पीछे है? सातवें अध्याय का यह पहला श्लोक उसी जिज्ञासा को जगाने का निमंत्रण है। यह कोई साधारण उपदेश नहीं है; यह एक सीधा आमंत्रण है कि आप अपने सीमित नजरिए से बाहर निकलकर ब्रह्मांड की अनंतता को देखें।

बहुत से युवा मुझसे पूछते हैं— "क्या भक्ति का मतलब सिर्फ भावुक होना है? क्या बुद्धि का इसमें कोई स्थान नहीं है?" कृष्ण इस अध्याय में यही बता रहे हैं कि भक्ति और ज्ञान का मेल कैसे होता है। वे आपको एक ऐसा सूत्र दे रहे हैं जिससे आप अपने काम को करते हुए, परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी भगवान को जान सकते हैं। यह अध्याय उन लोगों के लिए है जो तर्क चाहते हैं, जो सबूत चाहते हैं, और जो अपने जीवन को एक नए अर्थ से जोड़ना चाहते हैं।

तो, तैयार हो जाइए। आज हम उस सफर पर निकल रहे हैं जहाँ हम कृष्ण को केवल एक देवदूत या मार्गदर्शक के रूप में नहीं, बल्कि 'सर्वस्व' के रूप में समझेंगे। यह जानना कि भगवान क्या हैं, आपके जीवन की हर समस्या का समाधान है क्योंकि जब आप स्रोत को जान लेते हैं, तो लहरों का डर अपने आप मिट जाता है।

॥ ७.१ ॥
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥

सरल अर्थ और विश्लेषण

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को संबोधित कर रहे हैं। वे कहते हैं— 'हे पार्थ! मेरे प्रति आसक्त मन वाला होकर, मेरी शरण लेकर, योग का अभ्यास करता हुआ तू मुझे जैसे बिना किसी संदेह के पूर्ण रूप से जान सकेगा, उसे अब सुन।' यहाँ कृष्ण तीन मुख्य शर्तें रख रहे हैं: 'मय्यासक्तमनाः' (मन को मुझमें लगाना), 'मदाश्रयः' (मेरी शरण लेना), और 'योगं युञ्जन्म' (योग का अभ्यास)।

आइए इसे शब्दों में तोड़ें: मयि आसक्त-मनाः (जिसका मन मुझमें डूबा हो), पार्थ (हे अर्जुन), योगं युञ्जन् (योग का अभ्यास करते हुए), मत् आश्रयः (मेरे आश्रय में स्थित), असंशयम् (बिना किसी संदेह के), समग्रम् (पूर्ण रूप से), माम् (मुझे), यथा ज्ञास्यसि (जैसे जान सकोगे), तत् शृणु (वह सुनो)।

यहाँ कृष्ण का संदेश बहुत गहरा है। वे कह रहे हैं कि अगर तुम मुझे केवल एक छोटा सा हिस्सा समझकर पूजोगे, तो तुम मुझे कभी नहीं जान पाओगे। मुझे 'समग्र' (पूर्ण) जानना है। और यह कैसे संभव है? जब आप उनके प्रति अपना मन समर्पित कर देते हैं और अपनी हर गतिविधि को एक योग बना लेते हैं।

आचार्यों की दृष्टि में

स्वामी रामसुखदास जी: स्वामी जी 'मदाश्रयः' पर जोर देते हैं। वे कहते हैं कि जब तक आप पूरी तरह भगवान की शरण में नहीं होते, तब तक मन की भटकन बंद नहीं होगी। 'असंशयं' का अर्थ वे बताते हैं कि भगवान का ज्ञान ऐसा होना चाहिए जिसमें कोई तर्क-वितर्क की गुंजाइश न रहे। यह ज्ञान अनुभव से आता है। स्वामी जी समझाते हैं कि भगवान को जानना कोई बौद्धिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि समर्पण है। वे कहते हैं— 'जैसे ही आप अपना अहम छोड़ते हैं, भगवान अपने आप को आपके सामने प्रकट कर देते हैं।'

ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद: प्रभुपाद जी 'मय्यासक्तमनाः' को भक्ति योग के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण-भावनाभावित होना ही एकमात्र तरीका है। वे तर्क देते हैं कि हम अपनी इंद्रियों से भगवान को नहीं जान सकते, क्योंकि वे दिव्य हैं। जब हम कृष्ण की सेवा में अपने मन को लगाते हैं, तो वे स्वयं को हमारे भीतर प्रकाशित करते हैं। उनके लिए, यह श्लोक एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है—कैसे एक व्यक्ति अपनी चेतना को भगवान की चेतना से जोड़ सकता है।

स्वामी मुकुंदानंद जी: स्वामी जी इसे एक प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की तरह देखते हैं। वे कहते हैं कि हम अक्सर भगवान को 'पार्ट-टाइम' मानते हैं। लेकिन कृष्ण यहाँ 'मय्यासक्तमनाः' कह रहे हैं, यानी 24 घंटे का जुड़ाव। वे जिम का उदाहरण देते हैं—जैसे मांसपेशियों को बनाने के लिए बार-बार अभ्यास करना पड़ता है, वैसे ही मन को भगवान में लगाने का अभ्यास 'योग' है। वे कहते हैं— 'जब तक आप भगवान को अपने काम के बीच में नहीं लाते, तब तक भक्ति अधूरी है।'

जीवन में प्रयोग

कल्पना कीजिए, आप ऑफिस में एक डेडलाइन के दबाव में हैं। बॉस चिल्ला रहा है। आमतौर पर, आप तनाव में आ जाते हैं। लेकिन यदि आप 'मदाश्रयः' (भगवान की शरण) को अपनाते हैं, तो आप क्या करेंगे? आप काम करेंगे, पूरी मेहनत से करेंगे, लेकिन परिणाम के लिए चिंता नहीं करेंगे क्योंकि आप जानते हैं कि आपका आधार भगवान हैं। यही योग है। यह आपको ऑफिस की पॉलिटिक्स और तनाव से एक सुरक्षा कवच देता है।

ध्यान की स्थिति में भी यही लागू होता है। जब आप बैठने की कोशिश करते हैं और मन भागता है, तो खुद को डांटें नहीं। बस धीरे से मन को कहें— 'मैं तुम्हारे लिए ही बैठा हूँ, कृष्ण।' यह छोटे-छोटे क्षण ही आपको समग्र ज्ञान की ओर ले जाएंगे।

स्वयं से प्रश्न

Q: क्या भगवान को जानना कठिन है? A: स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं— नहीं, बस हमारा अहंकार उसे कठिन बनाता है। समर्पण सबसे आसान है। Q: क्या मुझे सब कुछ छोड़ना होगा? A: स्वामी मुकुंदानंद जी कहते हैं— नहीं, बस अपनी सोच बदलनी है। काम वही है, कर्ता का भाव बदल गया। Q: 'समग्र' जानने का क्या अर्थ है? A: प्रभुपाद जी कहते हैं— उनका विराट रूप और उनका व्यक्तिगत रूप दोनों को समझना। Q: मन बार-बार क्यों भटकता है? A: अभ्यास की कमी है। इसे योग की तरह लें। Q: क्या यह प्रैक्टिकल है? A: जी हाँ, क्योंकि यह आपके तनाव को कम करने का सबसे बड़ा टूल है।

🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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