क्या आप भी दूसरों की सफलता से असुरक्षित महसूस करते हैं?
कभी ऑफिस में किसी सहकर्मी की प्रमोशन हुई है? या फिर किसी दोस्त को नई गाड़ी खरीदते देखकर अचानक दिल में एक अजीब सी चुभन हुई है? हम अक्सर कहते हैं कि हमें दूसरों से कोई जलन नहीं है, लेकिन अंदर ही अंदर एक 'इनसिक्योरिटी' (असुरक्षा) का साया मंडराने लगता है। हम दूसरों की उपलब्धियों को अपनी हार की तरह देखने लगते हैं।
समस्या: अपनी असुरक्षा को दूसरों पर थोपना
दुर्योधन के साथ भी ठीक ऐसा ही था। वह अर्जुन की सेना को देख रहा था, लेकिन उसके मन में डर था। उसने द्रोणाचार्य से कहा कि देखिए आपके शिष्य ने कितनी बड़ी सेना तैयार की है। यहाँ वह अपनी हताशा और डर को बाहर निकाल रहा था। हम भी जब अपनी लाइफ में कहीं पीछे रह जाते हैं, तो हम अक्सर दूसरों की खूबियों में भी गलतियाँ ढूंढने लगते हैं ताकि हम खुद को सही साबित कर सकें।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् । व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥
इसका अर्थ है: "हे आचार्य! पांडवों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसे आपके ही बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न ने बड़ी कुशलता से व्यवस्थित किया है।"
तीन गुरु, एक श्लोक
स्वामी मुकुंदानंद जी
स्वामी जी कहते हैं कि दुर्योधन का मन विचलित था। जब हम मानसिक रूप से अस्थिर होते हैं, तो हम हर जगह खतरा देखते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारी बाहरी परेशानियाँ असल में हमारी आंतरिक अशांति का प्रतिबिंब होती हैं। यदि आपका मन शांत है, तो आपको प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि अवसर दिखाई देंगे।
श्रील प्रभुपाद
प्रभुपाद जी के अनुसार, दुर्योधन को डर था क्योंकि उसने अधर्म का रास्ता चुना था। जिसे पता होता है कि वह गलत है, उसे हर शक्तिशाली व्यक्ति अपना दुश्मन नजर आता है। भक्ति का मार्ग हमें यह विश्वास दिलाता है कि यदि हम सत्य के साथ हैं, तो डरने की कोई आवश्यकता नहीं।
स्वामी रामसुखदास जी
स्वामी जी इसे चेतावनी के रूप में देखते हैं। दुर्योधन ने द्रोणाचार्य को 'शिष्य' याद दिलाकर उन पर दबाव बनाने की कोशिश की। यह एक तरह की राजनीति है। हम भी अक्सर रिश्तों में अपनी बात मनवाने के लिए दूसरों को उनके पुराने एहसासों या कमजोरियों की याद दिलाते हैं।
आज के जीवन में
क्या यह मतलब है कि हम किसी की काबिलियत की तारीफ भी न करें? नहीं। यह मतलब है कि अपनी असुरक्षा को दूसरों पर न निकालें। अगर आपका कोई सहकर्मी अच्छा काम कर रहा है, तो उसके पीछे के 'धृष्टद्युम्न' (साजिश) ढूंढने के बजाय, अपनी तैयारी पर ध्यान दें। दुर्योधन की तरह दूसरों को दोषी ठहराने से युद्ध नहीं जीता जाता, खुद को बेहतर बनाने से जीता जाता है।
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निष्कर्ष
दूसरों की तरक्की से डरना बंद कीजिए। जिस दिन आप दूसरों के 'व्यूह' (रणनीति) को देखने के बजाय अपनी 'दृष्टि' (विजन) को सुधार लेंगे, उस दिन आपकी असुरक्षा खत्म हो जाएगी।
आज का चिंतन: क्या आप आज किसी ऐसे व्यक्ति से डर रहे हैं जो आपसे ज्यादा सफल है? क्या वह डर आपकी अपनी कमी है या उनकी ताकत?