कभी notice किया है?
जब कोई तारीफ करता है — तो पूरा दिन अच्छा लगता है।
जब कोई आलोचना करता है — तो पूरा दिन खराब हो जाता है।
जब कुछ अच्छा होता है — तो मन उछलता है।
जब कुछ बुरा होता है — तो मन धरातल पर आ जाता है।
यानी मन की स्थिति पूरी तरह बाहरी घटनाओं पर निर्भर है।
सुबह boss ने डाँटा — दिन बर्बाद।
शाम को किसी ने compliment दिया — मूड ठीक।
रात को कोई बुरी खबर आई — नींद गई।
यह मन की गुलामी है। और इसमें बहुत बड़ी ऊर्जा बर्बाद होती है।
लेकिन क्या कोई ऐसा रास्ता है जहाँ मन न उछले, न टूटे — बस स्थिर रहे?
हाँ। और वो रास्ता 5000 साल पहले बताया गया था।
न प्रहृष्येत्प्रियम् प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः॥
— भगवद गीता, अध्याय 5, श्लोक 20
प्रिय पाकर हर्षित न हो, अप्रिय पाकर उद्विग्न न हो — जो स्थिरबुद्धि है, जो सम्मोहरहित है, जो ब्रह्म को जानता है — वह ब्रह्म में स्थित है।
श्लोक को समझते हैं — शब्द दर शब्द
"न प्रहृष्येत् प्रियम् प्राप्य" — प्रिय पाकर, अच्छी खबर पाकर, सफलता पाकर — अत्यधिक हर्षित मत हो।
"नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्" — अप्रिय पाकर, बुरी खबर पाकर, असफलता पाकर — व्याकुल मत हो।
"स्थिरबुद्धिः" — जिसकी बुद्धि स्थिर है। जो हर परिस्थिति में एक जैसा सोच सकता है।
"असम्मूढः" — जो मोह से मुक्त है, जो भ्रमित नहीं है।
"ब्रह्मविद्" — जो ब्रह्म को जानता है, जिसे अपनी आत्मा का बोध है।
"ब्रह्मणि स्थितः" — वह ब्रह्म में स्थित है। वह परमात्मा के सबसे निकट है।
अब असली सवाल — क्या खुश होना गलत है? क्या दुखी होना गलत है?
नहीं। बिल्कुल नहीं।
और यहीं पर सबसे बड़ी गलतफहमी होती है।
श्रील प्रभुपाद Bhagavad Gita As It Is में बहुत स्पष्ट करते हैं — यह श्लोक भावनाओं को मारने की बात नहीं कर रहा। यह श्लोक उस अत्यधिक प्रतिक्रिया की बात कर रहा है जो मन को अस्थिर कर देती है। अच्छी खबर पर थोड़ी प्रसन्नता स्वाभाविक है — लेकिन उस प्रसन्नता में इतना डूब जाना कि विवेक खो जाए — यह "प्रहृष्येत्" है। बुरी खबर पर दुख स्वाभाविक है — लेकिन उस दुख में इतना डूब जाना कि कर्तव्य भूल जाए — यह "उद्विजेत्" है।
स्वामी मुकुन्दानन्द जी इसे एक बहुत सुंदर उदाहरण से समझाते हैं — वे कहते हैं कि एक कुशल नाविक वही है जो तूफान में भी नाव चला सके। तूफान आएगा — यह तय है। लेकिन नाविक की कुशलता इसमें है कि वह तूफान में भी दिशा न खोए। जो नाविक तूफान देखकर घबरा जाए और पतवार छोड़ दे — वह नाविक नहीं है। "स्थिरबुद्धि" वही नाविक है जो तूफान में भी शांत रहकर नाव चलाता है।
गीता प्रेस की टीका में "असम्मूढः" शब्द पर विशेष ध्यान दिया गया है — सम्मूढ़ यानी मोहग्रस्त, भ्रमित। और असम्मूढ़ यानी जो मोह से मुक्त है। जब इंसान किसी चीज़ में अत्यधिक आसक्त होता है — तो वह उस चीज़ के मिलने पर उछलता है और खोने पर टूटता है। यह मोह ही मन की अस्थिरता की जड़ है। और मोह तब टूटता है जब ब्रह्मज्ञान होता है — जब यह समझ आती है कि जो मिला है वह स्थायी नहीं, जो खोया है वह अंतिम नहीं।
मैं खुद एक सवाल पूछता हूं — यह "स्थिरबुद्धि" कैसा दिखता है असल ज़िंदगी में?
एक उदाहरण लो।
दो इंसान हैं। दोनों का एक बड़ा business deal टूट गया।
पहला इंसान — तीन दिन बिस्तर से नहीं उठा। खाना नहीं खाया। सोचता रहा — "सब खत्म हो गया, अब क्या होगा, मैं बर्बाद हो गया।"
दूसरा इंसान — उस रात ठीक से सोया। सुबह उठा। बैठकर सोचा — "क्या गलत हुआ? अगली बार क्या अलग करूँगा?" और अगले हफ्ते नए सिरे से शुरू किया।
दोनों को एक जैसा नुकसान हुआ।
लेकिन पहले का मन "उद्विग्न" हुआ — वह परिस्थिति में डूब गया।
दूसरे का मन "स्थिर" रहा — वह परिस्थिति से ऊपर रहा।
यही "स्थिरबुद्धिः" और "उद्विजेत्" का फर्क है।
और यह फर्क talent में नहीं था। यह फर्क मन की अवस्था में था।
आज के ज़माने में "प्रिय" और "अप्रिय" कैसे दिखते हैं?
श्रीकृष्ण ने "प्रियम्" और "अप्रियम्" कहा — प्रिय और अप्रिय।
आज 2025 में यह कैसा दिखता है?
प्रिय —
Post पर हज़ार likes आ गए
Boss ने सबके सामने तारीफ की
Promotion मिल गया
Result अच्छा आया
अप्रिय —
Post पर कोई reaction नहीं आया
किसी ने public में आलोचना की
Rejection मिली
Result खराब आया
और हर बार जब "प्रिय" मिलता है — मन उछलता है।
हर बार जब "अप्रिय" मिलता है — मन गिरता है।
यह उछलना और गिरना — यही मन की सबसे बड़ी बर्बादी है।
क्योंकि जब मन उछलता है — तो अहंकार आता है।
जब मन गिरता है — तो निराशा आती है।
दोनों ही अवस्थाओं में स्पष्ट सोच नहीं होती। और जब स्पष्ट सोच नहीं — तो सही निर्णय नहीं। और जब सही निर्णय नहीं — तो जीवन भटकता है।
"स्थिरबुद्धि" वह है जो इस उछलने-गिरने के चक्र से बाहर है।
"ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः" — यह क्या है?
यह श्लोक का सबसे गहरा हिस्सा है।
गीता कह रही है — जो स्थिरबुद्धि है, जो असम्मूढ़ है — वह ब्रह्मविद् है, ब्रह्म को जानने वाला। और वह ब्रह्म में स्थित है।
इसका अर्थ यह है कि मन की स्थिरता केवल एक मनोवैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है। यह एक आध्यात्मिक अवस्था है।
जब मन स्थिर होता है — तो वह परमात्मा के सबसे निकट होता है। क्योंकि परमात्मा स्वयं सम, स्थिर, अविचल है। और जो इंसान उस स्थिरता को प्राप्त करता है — वह परमात्मा के स्वभाव को प्राप्त करता है।
प्रभुपाद जी कहते हैं — यही ब्रह्म-निर्वाण की अवस्था है। यही मोक्ष की शुरुआत है।
मन को स्थिर रखने के 4 व्यावहारिक तरीके — गीता 5:20 से
1. प्रतिक्रिया से पहले एक पल रुको।
स्वामी मुकुन्दानन्द जी कहते हैं — अच्छी खबर हो या बुरी, पहली प्रतिक्रिया से पहले एक गहरी साँस लो। बस एक पल। वह एक पल मन को उछलने या गिरने से रोकता है। और उस एक पल में विवेक जागता है।
2. हर चीज़ की अस्थायिता याद रखो।
गीता प्रेस की टीका याद दिलाती है — "असम्मूढः" वह है जो जानता है कि जो मिला है वह स्थायी नहीं। जब यह बोध गहरा हो जाता है — तो अत्यधिक हर्ष और अत्यधिक शोक दोनों कम हो जाते हैं। अच्छे समय में याद रखो कि यह भी बदलेगा। बुरे समय में याद रखो कि यह भी बदलेगा।
3. अपनी पहचान को परिणामों से अलग करो।
प्रभुपाद जी की व्याख्या में यह बार-बार आता है — जब तक तुम अपनी पहचान को परिणामों से जोड़ते रहोगे — "मैं तभी अच्छा हूँ जब result अच्छा आए" — तब तक मन अस्थिर रहेगा। अपनी पहचान को आत्मा से जोड़ो — जो न बढ़ती है न घटती है किसी परिणाम से।
4. प्रतिदिन स्थिरता का अभ्यास करो।
स्वामी मुकुन्दानन्द जी कहते हैं — स्थिरबुद्धि एक दिन में नहीं बनती। यह एक अभ्यास है। प्रतिदिन छोटी-छोटी परिस्थितियों में स्थिर रहने का अभ्यास करो। कोई traffic में काट दे — स्थिर रहो। कोई काम में गलती निकाले — स्थिर रहो। धीरे-धीरे यह अभ्यास बड़ी परिस्थितियों में भी काम करने लगता है।
अंतिम बात — चट्टान बनो, पत्ता नहीं
पत्ता हर हवा में हिलता है।
चट्टान तूफान में भी अपनी जगह रहती है।
मन को पत्ता बनाना आसान है — दुनिया खुद बनाती रहती है।
मन को चट्टान बनाना — यह साधना है। यह अभ्यास है। यह गीता का रास्ता है।
जब प्रिय मिले — मुस्कुराओ, लेकिन उछलो मत।
जब अप्रिय मिले — स्वीकार करो, लेकिन टूटो मत।
और जब यह अवस्था आने लगे — तब समझो कि "स्थिरबुद्धि" की दिशा में पहला कदम उठ गया।
यही गीता 5:20 का वो जवाब है जो हर बेचैन इंसान को चाहिए।
To read gita shloka 5.19.
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