भगवद गीता 6.10 — ध्यान करना चाहते हो? पहले यह पाँच चीज़ें जान लो

Published: 11 जून 2026 भगवद गीता 6.10 — ध्यान करना चाहते हो? पहले यह पाँच चीज़ें जान लो 🇺🇸 Read in English

बहुत लोग ध्यान करना चाहते हैं। Apps download करते हैं, YouTube videos देखते हैं, किताबें खरीदते हैं। पर कुछ दिन बाद वही हाल — मन भटकता है, टिकता नहीं, और धीरे-धीरे ध्यान छूट जाता है। फिर सोचते हैं — "शायद ध्यान मेरे लिए नहीं है।"

पर असली बात यह है — ध्यान इसलिए नहीं होता क्योंकि हम ध्यान की बाहरी विधि तो जानते हैं, पर उसके लिए ज़रूरी अंदरूनी और बाहरी तैयारी नहीं करते। और वह तैयारी क्या है — यही इस श्लोक में कृष्ण बता रहे हैं।

यह श्लोक छठे अध्याय का एक turning point है। यहाँ से कृष्ण practical instruction देना शुरू करते हैं — ध्यान कैसे करें, कहाँ करें, किस मनस्थिति में करें। और पहली बात — यह पाँच शर्तें पूरी करो।

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।

एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ ६.१० ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — योगी को चाहिए कि वह सदा अपने मन को परमात्मा में लगाए — एकांत में रहकर, अकेले, मन और शरीर को वश में करके, आशा रहित होकर, और संग्रह का त्याग करके।

पाँच बातें — रहसि यानी एकांत में। एकाकी यानी अकेले। यतचित्तात्मा यानी मन और शरीर को वश में करके। निराशी यानी आशाओं से रहित। अपरिग्रह यानी संग्रह न करना। यह पाँचों मिलकर ध्यान की नींव बनाते हैं।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर कहते हैं कि सततम् — यानी सदा — यह शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। ध्यान केवल सुबह आधे घंटे बैठने का नाम नहीं है। सततम् का मतलब है — हर पल, हर काम में, हर सोच में — मन की एक धारा परमात्मा की तरफ बहती रहे।

वे रहसि — एकांत — पर कहते हैं कि एकांत केवल जंगल में जाकर नहीं मिलता। घर में भी एकांत मिल सकता है — अगर मन बाहरी शोर से थोड़ी देर के लिए हट जाए। सुबह जल्दी उठकर, रात को सब सोने के बाद — यह एकांत के सबसे अच्छे समय हैं।

निराशी — आशाओं से रहित — पर स्वामी जी कहते हैं कि यह ध्यान में बैठकर यह सोचना बंद करना है कि "मुझे आज कुछ experience होगा", "मुझे शांति मिलेगी", "मुझे भगवान दिखेंगे।" यह आशाएं ही ध्यान को तोड़ती हैं। बिना किसी expectation के बैठो — जो होगा, होगा।

अपरिग्रह — संग्रह न करना — पर स्वामी जी कहते हैं कि यह केवल भौतिक चीज़ों का संग्रह नहीं है। मन में अनुभवों का, यादों का, शिकायतों का संग्रह भी इसी में आता है। जब मन खाली हो — तभी परमात्मा के लिए जगह बनती है।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि यहाँ कृष्ण ध्यान के लिए आवश्यक बाहरी और अंदरूनी दोनों तरह की तैयारी बता रहे हैं। बाहरी — एकांत और अकेलापन। अंदरूनी — मन का संयम, आशाओं का त्याग, और संग्रह का त्याग।

वे एकाकी — अकेले — पर कहते हैं कि ध्यान एक बहुत personal process है। भीड़ में, शोर में, लोगों के बीच — गहरा ध्यान बहुत मुश्किल है। इसीलिए हर साधक को रोज़ कुछ समय ऐसा निकालना चाहिए जब वह सच में अकेला हो — फोन बंद, बाहरी आवाज़ें कम।

प्रभुपाद जी अपरिग्रह पर कहते हैं कि जो भक्त कृष्ण में स्थित है, उसके लिए अपरिग्रह स्वाभाविक हो जाता है। क्योंकि जब परमात्मा मिल जाए — तो बाकी सब इकट्ठा करने की ज़रूरत ही नहीं रहती। जैसे जिसके पास सूरज हो — वह दीपक इकट्ठा क्यों करेगा?

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज के distracted इंसान से जोड़ते हैं। वे कहते हैं — आज हम सबके जीवन में एकांत लगभग खत्म हो गया है। जब भी थोड़ा खाली समय मिलता है — फोन उठा लेते हैं। जब भी थोड़ा अकेलापन लगता है — कोई show चला लेते हैं। हम एकांत से डरने लगे हैं। और यही डर ध्यान को रोकता है।

वे कहते हैं — रहसि एकाकी — एकांत में अकेले — यह दोनों एक साथ ज़रूरी हैं। बाहर से अकेले हों और अंदर से भी अकेले — यानी मन में भी भीड़ न हो। जब दोनों मिलें — तब ध्यान की असली शुरुआत होती है।

स्वामी जी निराशी पर एक बहुत practical बात कहते हैं — वे कहते हैं कि ध्यान में बैठकर यह सोचना कि "आज कुछ special होगा" — यही सबसे बड़ी रुकावट है। ध्यान एक surrender है — भगवान के सामने खाली हाथ जाना। कोई माँग नहीं, कोई उम्मीद नहीं। बस उपस्थित होना।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

सुबह 5 बजे उठना — जब घर में सब सो रहे हों। फोन airplane mode पर। एक कोना जहाँ बैठो। आँखें बंद। साँस पर ध्यान। कोई expectation नहीं — बस यह 15-20 मिनट। यह है रहसि एकाकी — आज के गृहस्थ जीवन में।

या दोपहर में office की lunch break में — 10 मिनट के लिए अकेले बैठना, फोन न देखना, बस चुप रहना। यह भी एकांत है। यह भी ध्यान की तैयारी है।

और अपरिग्रह — रोज़ की ज़िंदगी में इसका मतलब है — उन चीज़ों को छोड़ना जो ज़रूरत से ज़्यादा हैं। घर में बेकार की चीज़ें, मन में बेकार की यादें और शिकायतें, दिल में बेकार के grudges। जैसे-जैसे यह खाली होता है — अंदर जगह बनती है।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: गृहस्थ जीवन में एकांत कैसे मिलेगा — घर में हमेशा शोर रहता है?

स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — एकांत बाहर नहीं, अंदर बनता है। सुबह जल्दी उठो, रात को देर से सोओ — इन दोनों के बीच थोड़ा समय ऐसा निकालो जब तुम सच में अकेले हो। यह 10-15 मिनट भी काफी है शुरुआत के लिए।

सवाल: सततम् — हर पल ध्यान — क्या यह सम्भव है?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — शुरुआत में नहीं। पर जैसे-जैसे अभ्यास होता है — एक धारा बनती है। जैसे नदी बहती रहती है चाहे रास्ते में कुछ भी आए — वैसे ही मन की एक धारा परमात्मा की तरफ बहती रहती है। यह धीरे-धीरे बनती है।

सवाल: निराशी — बिना expectation के ध्यान करना — तो फिर ध्यान करें क्यों?

प्रभुपाद जी कहते हैं — ध्यान का कारण है — भगवान से जुड़ना। फल की expectation नहीं। जैसे माँ बच्चे को प्यार इसलिए नहीं करती कि बदले में कुछ मिलेगा — बस करती है। वैसे ही ध्यान करो — बस करो।

सवाल: अपरिग्रह — क्या सब कुछ छोड़ देना होगा?

स्वामी रामसुखदास जी स्पष्ट करते हैं — ज़रूरत की चीज़ें रखो। पर ज़रूरत से ज़्यादा जमा करने की आदत छोड़ो। और मन में जो अनावश्यक बोझ है — वह भी छोड़ो। यह भौतिक और मानसिक — दोनों तरह का अपरिग्रह है।

सवाल: 6.9 और 6.10 मिलकर क्या सिखाते हैं?

6.9 ने बताया — योगी की पहचान है सबमें समभाव। 6.10 बताता है — वह समभाव और वह योग कैसे साधा जाए। एकांत, अकेलापन, मन का संयम, आशाओं का त्याग, और अपरिग्रह — यह पाँच शर्तें पूरी करो। समभाव अपने आप बढ़ता जाएगा।

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https://krishnbhakti.com/hindi-blogs/gita-shloka-6-9-sab-mein-ek-nazar-se-dekhna

🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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