भगवद गीता 6.14 — ध्यान में मन कहाँ लगाएं? कृष्ण ने बताया है वो राज़

Published: 15 जून 2026 भगवद गीता 6.14 — ध्यान में मन कहाँ लगाएं? कृष्ण ने बताया है वो राज़ 🇺🇸 Read in English

पिछले तीन श्लोकों में कृष्ण ने ध्यान की बाहरी तैयारी बताई — जगह, आसन, शरीर की स्थिति। अब इस श्लोक में वे सबसे महत्वपूर्ण बात बताते हैं — ध्यान में मन को कहाँ लगाएं? क्योंकि बाहरी सब कुछ ठीक हो — पर अगर मन का ठिकाना न हो — तो ध्यान नहीं होगा।

और इसके साथ कृष्ण चार और चीज़ें बताते हैं जो ध्यान के लिए ज़रूरी हैं — शांत मन, भय से मुक्ति, ब्रह्मचर्य, और मन को मुझमें लगाना। यह चारों मिलकर ध्यान का वह भीतरी आधार बनाते हैं जिसके बिना कोई भी बाहरी तैयारी काम नहीं करती।

यह श्लोक उन सबके लिए है जो ध्यान में बैठते हैं पर मन को कहीं टिकाना नहीं आता। कृष्ण कह रहे हैं — मुझमें लगाओ। और मन की यह स्थिति कैसी होनी चाहिए — वह भी बता रहे हैं।

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।

मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ ६.१४ ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — शांत मन वाला, भय से रहित, ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित — मन को संयमित करके, मुझमें चित्त लगाकर, मुझे ही परम लक्ष्य मानकर बैठो — यही युक्त होना है।

पाँच बातें — प्रशान्तात्मा यानी शांत मन। विगतभीः यानी भय से रहित। ब्रह्मचारिव्रते स्थितः यानी ब्रह्मचर्य में स्थित। मनः संयम्य यानी मन को संयमित करके। मच्चित्तः मत्परः यानी मुझमें चित्त लगाकर, मुझे परम लक्ष्य मानकर। यह पाँचों मिलकर ध्यान की आत्मा बनाते हैं।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर कहते हैं कि प्रशान्तात्मा — शांत मन — यह ध्यान की पूर्वशर्त है। जब मन में उथल-पुथल हो, चिंताएं हों, क्रोध हो — तब ध्यान बहुत कठिन होता है। इसीलिए ध्यान से पहले मन को थोड़ा शांत करना ज़रूरी है — चाहे भजन से, चाहे प्राणायाम से, चाहे कुछ पल चुप बैठकर।

वे विगतभीः — भय से रहित — पर बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं। वे कहते हैं — ध्यान में सबसे बड़ी रुकावट डर है। "क्या होगा अगर कुछ experience हुआ?", "क्या होगा अगर कुछ नहीं हुआ?", "मैं सही कर रहा हूँ या गलत?" — यह सब डर के रूप हैं। जब यह डर जाता है — तो ध्यान में एक आज़ादी आती है।

ब्रह्मचारिव्रते स्थितः पर स्वामी जी कहते हैं कि ब्रह्मचर्य का मतलब केवल शारीरिक संयम नहीं है। ब्रह्मचर्य का मतलब है — ब्रह्म यानी परमात्मा में चरण — यानी परमात्मा में विचरण करना। जब मन परमात्मा में लगा हो — तो बाहरी इंद्रियों का संयम स्वाभाविक हो जाता है।

मच्चित्तः मत्परः — मुझमें चित्त, मुझे परम लक्ष्य — पर स्वामी जी कहते हैं कि यह इस पूरे श्लोक की आत्मा है। ध्यान का अंतिम लक्ष्य कोई technique नहीं है, कोई experience नहीं है — अंतिम लक्ष्य है कृष्ण। जब मन कृष्ण में लग जाए — तो बाकी सब अपने आप होता जाता है।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि यहाँ कृष्ण ध्यान के inner और outer दोनों aspects को एक साथ बता रहे हैं। बाहरी — ब्रह्मचर्य और संयम। भीतरी — शांत मन, भय से मुक्ति, और कृष्ण में चित्त।

वे ब्रह्मचर्य पर विशेष ज़ोर देते हैं। वे कहते हैं — ब्रह्मचर्य के बिना गहरा ध्यान बहुत कठिन है। जब इंद्रियाँ बाहरी विषयों में भटकती हैं — तो मन को एकाग्र करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इंद्रियों का संयम ध्यान की नींव है।

प्रभुपाद जी मच्चित्तः — मुझमें चित्त — पर कहते हैं कि यह पूरे ध्यान का सार है। ध्यान का लक्ष्य कोई abstract void नहीं है — ध्यान का लक्ष्य है कृष्ण। जब मन कृष्ण में टिकता है — तो वह सच्चा ध्यान है। और यही भक्तियोग का सार भी है।

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज के anxiety-ridden इंसान से जोड़ते हैं। वे कहते हैं — आज के युग में विगतभीः — भय से रहित — सबसे कठिन शर्त है। हम सब किसी न किसी डर के साथ जी रहे हैं। भविष्य का डर, असफलता का डर, अकेलेपन का डर, मृत्यु का डर। और यह डर ध्यान में भी आता है।

वे कहते हैं — ध्यान का सबसे बड़ा gift यह है कि जब आप रोज़ ध्यान करते हैं — तो धीरे-धीरे डर कम होता जाता है। क्योंकि ध्यान में आप उस शक्ति से जुड़ते हैं जो सब डरों से बड़ी है। जब भगवान साथ हों — तो डर कहाँ?

स्वामी जी प्रशान्तात्मा पर एक बहुत practical tip देते हैं — वे कहते हैं कि ध्यान से पहले 5-10 मिनट का प्राणायाम करो। गहरी साँस लो, धीरे छोड़ो। यह मन को automatically शांत करता है। और जब मन शांत होकर ध्यान में जाता है — तो depth बहुत ज़्यादा होती है।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

ध्यान से पहले — 5 मिनट चुप बैठो। कोई भजन सुनो या बस साँस को feel करो। मन को थोड़ा शांत होने दो। यह है प्रशान्तात्मा की तैयारी। उसके बाद ध्यान में बैठो — तो मन बहुत जल्दी settle होता है।

और विगतभीः — ध्यान में बैठते समय यह भाव रखो — "जो होगा, अच्छा होगा। मैं भगवान के सामने हूँ। कोई डर नहीं।" यह एक छोटा सा सुझाव है पर ध्यान की quality बदल देता है।

और मच्चित्तः — मन को कहाँ लगाएं? कृष्ण के किसी रूप पर — उनकी मुस्कान पर, उनके चरणों पर, उनके नाम पर। जब भी मन भटके — वापस उसी रूप पर लाओ। यही है मच्चित्त ध्यान — और यही सबसे सरल और सबसे गहरा ध्यान है।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: ब्रह्मचर्य — क्या यह केवल गृहस्थों के लिए नहीं है?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — ब्रह्मचर्य का असली मतलब है परमात्मा में मन को रखना। गृहस्थ भी ब्रह्मचर्य का पालन कर सकता है — अपने कर्तव्यों को निभाते हुए, पर इंद्रियों को बेकार के विषयों में न भटकाते हुए।

सवाल: ध्यान में डर क्यों आता है — और इसे कैसे दूर करें?

स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — डर इसलिए आता है क्योंकि मन नई जगह — अंदर की जगह — से परिचित नहीं है। जैसे-जैसे ध्यान का अभ्यास बढ़ता है, वह जगह परिचित होती जाती है और डर कम होता जाता है।

सवाल: मच्चित्त — कृष्ण में मन लगाना — practically कैसे करें?

प्रभुपाद जी कहते हैं — कृष्ण का कोई रूप मन में लाओ — जैसे वृंदावन में बाँसुरी बजाते कृष्ण, या गीता उपदेश देते कृष्ण। उस रूप पर मन टिकाओ। जब भटके — वापस लाओ। यही है मच्चित्त ध्यान।

सवाल: अगर मन शांत नहीं है तो क्या ध्यान करना बेकार है?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — बेकार नहीं। अशांत मन के साथ भी ध्यान करो — बस थोड़ी तैयारी पहले करो। प्राणायाम, भजन, या बस कुछ पल चुप बैठना — यह मन को जल्दी शांत करता है।

सवाल: 6.13 और 6.14 मिलकर क्या सिखाते हैं?

6.13 ने बताया — शरीर कैसे रखो — सीधा, अचल, दृष्टि स्थिर। 6.14 बताता है — मन कैसे रखो — शांत, भयरहित, ब्रह्मचर्य में, कृष्ण में लगाकर। दोनों मिलकर ध्यान की complete state देते हैं — शरीर की state और मन की state। यही है सच्चे ध्यान की पूरी तस्वीर।

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https://krishnbhakti.com/hindi-blogs/gita-shloka-6-13-body-posture-dhyan-mein

🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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