भगवद गीता 6.23 — दुख से संयोग का टूटना ही असली योग है — और इसे दृढ़ निश्चय से साधो

Published: 28 जून 2026 भगवद गीता 6.23 — दुख से संयोग का टूटना ही असली योग है — और इसे दृढ़ निश्चय से साधो 🇺🇸 Read in English

योग क्या है? यह सवाल जब भी पूछा जाता है — अलग-अलग जवाब मिलते हैं। कोई कहता है body को fit रखना, कोई कहता है meditation, कोई कहता है breathing exercises। पर इस श्लोक में कृष्ण योग की एक ऐसी परिभाषा देते हैं जो शायद आपने पहले कभी इस तरह नहीं सुनी होगी।

कृष्ण कहते हैं — दुख के संयोग से वियोग का नाम ही योग है। यानी जब तक दुख और तुम्हारा साथ है — तब तक योग नहीं। जब दुख का संयोग टूट जाए — वही योग है। यह बहुत गहरी बात है। योग कोई addition नहीं है — यह एक subtraction है। दुख को जीवन से subtract करने का नाम योग है।

और साथ में कृष्ण एक और ज़रूरी बात बताते हैं — इस योग को कैसे साधें? दृढ़ निश्चय से और बिना किसी हताशा के। यह two-in-one instruction है — what और how दोनों एक साथ।

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ ६.२३ ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — दुख के संयोग से वियोग को ही योग जानो। और इस योग को दृढ़ निश्चय से और अनिर्विण्ण चित्त से — यानी बिना हताश हुए — साधना चाहिए।

दो बातें — दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् यानी दुख के संयोग से वियोग का नाम ही योग। और स निश्चयेन योक्तव्यः अनिर्विण्णचेतसा यानी इसे दृढ़ निश्चय से और बिना हताशे के साधो। यह दोनों मिलकर योग की सबसे व्यावहारिक definition और उसे साधने का तरीका देते हैं।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर कहते हैं कि दुःखसंयोगवियोग — दुख के संयोग से वियोग — यह शब्द बहुत carefully chosen है। संयोग का मतलब है जोड़। हमारा दुख से एक जोड़ है — हम उससे जुड़े हैं, उसे अपना मानते हैं। जब यह जोड़ टूट जाता है — वियोग होता है। और यही योग है।

वे कहते हैं — यहाँ यह नहीं कहा गया कि दुख आना बंद होगा। दुख की परिस्थिति आ सकती है — पर आपका उससे जोड़ नहीं रहेगा। जैसे पानी में कमल रहता है पर भीगता नहीं — वैसे ही दुख की परिस्थिति में होना और उससे जुड़ा न होना। यही वियोग है।

अनिर्विण्णचेतसा — बिना हताश हुए — पर स्वामी जी बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं। वे कहते हैं — साधना में सबसे बड़ी बाधा निर्वेद है — हताशा, थकान, "अब नहीं होगा" वाला भाव। यह भाव जब भी आए — उसे reject करो। कृष्ण खुद कह रहे हैं — बिना हताशे के साधो। यानी हताशा आना स्वाभाविक है — पर उसमें रुकना नहीं।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि यहाँ कृष्ण योग की एक बिल्कुल अलग और बहुत precise definition दे रहे हैं। योग केवल कुछ जोड़ना नहीं है — यह दुख के साथ जोड़ को तोड़ना है। यह एक negative definition है जो positive result देती है।

वे स निश्चयेन — दृढ़ निश्चय से — पर कहते हैं कि यह half-hearted effort से नहीं होगा। जो इंसान थोड़ा करके देख रहा है — उसे यह नहीं मिलेगा। जो पूरी तरह committed है — उसे मिलेगा। Commitment की यह demand गीता बार-बार करती है — यहाँ भी।

प्रभुपाद जी अनिर्विण्णचेतसा पर कहते हैं कि यह शब्द बहुत practical है। साधना में उतार-चढ़ाव आते हैं। कभी अच्छा लगता है, कभी बिल्कुल खाली लगता है। उस खाली लगने के वक्त — निर्वेद — हताशा — सबसे बड़ा danger है। कृष्ण पहले से warn कर रहे हैं — वह आएगा, उसमें रुकना मत।

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज के "quick results" culture से जोड़ते हैं। वे कहते हैं — आज लोग हर चीज़ में instant results चाहते हैं। 7-day meditation challenge, 21-day transformation। पर spiritual progress इस तरह नहीं होती। और जब quick results नहीं मिलते — तो निर्वेद आता है, हताशा आती है, और साधना छोड़ दी जाती है।

वे कहते हैं — दुःखसंयोगवियोग की यह definition बहुत liberating है। इसका मतलब है कि योग का goal है — दुख का attachment तोड़ना। और यह attachment तब टूटता है जब हम अंदर से उस जगह में स्थित हो जाते हैं जो दुख से ऊपर है। यह एक process है — और इसमें time लगता है।

स्वामी जी अनिर्विण्णचेतसा पर एक बहुत सुंदर बात कहते हैं — वे कहते हैं कि हर great achievement में एक point आता है जब लगता है — "मुझसे नहीं होगा।" वह point actually एक turning point होता है — अगर उसे cross कर लिया तो breakthrough मिलता है। Spiritual journey में भी यही होता है। जो उस निर्वेद के point को cross कर लेता है — वह breakthrough की तरफ बढ़ता है।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

सोचिए — आप कई महीनों से ध्यान कर रहे हैं। शुरुआत में थोड़ा अच्छा लगा। फिर routine हो गया। अब कभी-कभी लगता है — "क्या फर्क पड़ रहा है? मेरे जीवन में कुछ बदला नहीं।" यह है निर्वेद — हताशा। और यही वह moment है जब कृष्ण का यह instruction काम आता है — अनिर्विण्णचेतसा। इस moment में रुको मत। Continue करो।

और दुःखसंयोगवियोग — रोज़ की ज़िंदगी में यह दिखता है जब कोई बुरी खबर आती है और मन पल भर के लिए हिलता है — पर फिर एक breath लेकर वापस आ जाता है। वह "जोड़" जो पहले बहुत tight था — वह थोड़ा ढीला होने लगता है। यह छोटा सा change योग की शुरुआत है।

और स निश्चयेन — दृढ़ निश्चय — यह रोज़ सुबह उठकर उस cushion पर बैठने में दिखता है — चाहे mood हो या न हो, चाहे कल अच्छा ध्यान हुआ हो या बुरा। वह consistency ही दृढ़ निश्चय है।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: दुख का वियोग — क्या इसका मतलब दुख महसूस न करना है?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — नहीं। महसूस होगा — पर वह आपको define नहीं करेगा, उसमें डूबोगे नहीं। जैसे rain में जाना और भीगना अलग-अलग हैं — दुख की परिस्थिति में होना और उससे जुड़ना अलग-अलग हैं।

सवाल: हताशा आए तो क्या करें — practically?

स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — उस moment में भजन करो, किसी सत्संग में जाओ, गीता का कोई श्लोक पढ़ो। यह external support उस moment में bridge बनाता है। हताशा temporary है — उसे permanent न बनने दो।

सवाल: दृढ़ निश्चय कैसे बनाएं जब मन कमज़ोर हो?

प्रभुपाद जी कहते हैं — निश्चय एक decision है — emotion नहीं। जब मन कमज़ोर हो, तब भी decision को hold करो। जैसे एक किसान बारिश हो या न हो — खेत में जाता रहता है। उसका decision उसकी emotion पर depend नहीं करता।

सवाल: यह definition — दुख के संयोग से वियोग — यह दूसरी definitions से कैसे अलग है?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — यह definition result-based है। योग कोई technique नहीं है — योग एक state है। और उस state की पहचान है — दुख का जोड़ टूट जाना। technique अलग-अलग हो सकती हैं — result एक ही है।

सवाल: 6.22 और 6.23 मिलकर क्या सिखाते हैं?

6.22 ने बताया — उस अवस्था के दो effects — कुछ और नहीं चाहिए और दुख नहीं हिलाता। 6.23 बताता है — उस अवस्था को क्या कहते हैं — दुख से वियोग। और उसे कैसे साधते हैं — दृढ़ निश्चय और बिना हताशे के। Effects और definition और method — तीनों मिलकर एक पूरी तस्वीर बनाते हैं।

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🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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