भगवद गीता 6.26 — मन जहाँ-जहाँ भागे, वहाँ-वहाँ से वापस लाओ — यही ध्यान है

Published: 1 जुलाई 2026 भगवद गीता 6.26 — मन जहाँ-जहाँ भागे, वहाँ-वहाँ से वापस लाओ — यही ध्यान है 🇺🇸 Read in English

ध्यान के बारे में एक बहुत common misconception है — लोग सोचते हैं कि ध्यान में मन को बिल्कुल नहीं भटकना चाहिए। और जब मन भटकता है — तो वे frustrated हो जाते हैं, खुद को fail मान लेते हैं। "मुझसे ध्यान नहीं होता" — यह सोचकर practice छोड़ देते हैं।

पर इस श्लोक में कृष्ण एक बात बहुत clearly कहते हैं जो हर meditator को पता होनी चाहिए — मन भटकेगा। यह guarantee है। यह failure नहीं है। और जब भी भटके — बस वापस लाओ। यही ध्यान है। यही practice है।

यह श्लोक गीता के सबसे practical और सबसे compassionate श्लोकों में से एक है। यह कृष्ण का वह moment है जब वे एक experienced teacher की तरह कहते हैं — "हाँ, मन भटकेगा। मैं जानता हूँ। पर इसमें हताश मत होना। बस वापस लाते रहो।"

यतो यतो निश्चलति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।

ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ ६.२६ ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ से भटके — वहाँ-वहाँ से उसे रोककर, वश में करके, आत्मा में ही लाओ।

यह श्लोक बहुत simple है पर बहुत गहरा है। यतो यतो निश्चलति — जहाँ-जहाँ से भटके। मनः चंचलम् अस्थिरम् — यह चंचल, अस्थिर मन। ततः ततः नियम्य — वहाँ-वहाँ से रोककर। एतद् आत्मनि एव वशं नयेत् — इसे आत्मा में ही वश में लाओ। यह पूरा instruction एक continuous loop की बात करता है — भटको, वापस आओ, भटको, वापस आओ।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर कहते हैं कि यह श्लोक साधक को एक बहुत ज़रूरी permission देता है — मन भटकना allowed है। कृष्ण ने खुद मन को चंचल और अस्थिर कहा है। यानी मन का भटकना उसका स्वभाव है — इसमें साधक की गलती नहीं है।

वे कहते हैं — गलती तब होती है जब साधक मन के भटकने पर उसके पीछे चला जाता है और वापस नहीं लाता। वापस न लाना — यह failure है। भटकना — यह तो process का हिस्सा है। यतो यतो निश्चलति... ततः ततः नियम्य — यह एक loop describe करता है जो बार-बार होगा — और हर बार वापस लाना ही progress है।

स्वामी जी एक बहुत important बात कहते हैं — वे कहते हैं कि आत्मनि एव वशं नयेत् — आत्मा में ही वश में लाओ — यहाँ एव पर ज़ोर है। मन को कहीं और नहीं, सिर्फ आत्मा में। बाकी जगह लाने से वह फिर भटकेगा — आत्मा में टिकाने से ही वह settle होगा।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि यह verse ध्यान की practical reality को acknowledge करता है। कोई भी meditator — शुरुआती हो या अनुभवी — यह face करता है कि मन बार-बार भटकता है। यह verse उस reality को validate करता है और साथ ही उसका solution भी देता है।

वे चंचलम् अस्थिरम् — चंचल, अस्थिर — पर कहते हैं कि कृष्ण ने पहले ही 6.34 में (जो आगे आएगा) Arjuna के मुँह से यही कहलाया था — मन बहुत चंचल है। और यहाँ 6.26 में वे उसका solution दे रहे हैं। Solution simple है — वापस लाओ। हर बार।

प्रभुपाद जी भक्तियोग के context में कहते हैं — भक्त के लिए यह "वापस लाना" कृष्ण में लाना है। जब भी मन कहीं जाए — कृष्ण के नाम पर, कृष्ण के रूप पर वापस लाओ। यह एक loving, gentle practice है — force नहीं, invitation है।

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज के frustrated meditators से directly बात करते हुए explain करते हैं। वे कहते हैं — अगर ध्यान में मन भटकता है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप fail हो गए। इसका मतलब है कि आप meditate कर रहे हैं। भटकना और वापस आना — यही ध्यान है।

वे एक बहुत beautiful analogy देते हैं — वे कहते हैं कि ध्यान gym workout की तरह है। जब आप weight lift करते हैं — muscle तब build होती है जब वह strain करती है और recover करती है। ध्यान में मन के भटकने पर — वापस लाना — यह वह "rep" है जो mental muscle build करती है। जितनी बार वापस लाओ — उतनी ज़्यादा training।

स्वामी जी यतो यतो निश्चलति... ततः ततः नियम्य पर कहते हैं — यह pattern infinite patience की बात करता है। "जहाँ-जहाँ से भटके, वहाँ-वहाँ से लाओ।" यह sentence structure ही यह बता रहा है कि यह बार-बार होगा — और हर बार का response same होगा — गुस्से से नहीं, प्यार से, patience से वापस लाना।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

ध्यान में बैठे हो। साँस पर ध्यान लगाया। दो seconds में मन office की meeting पर चला गया। आपने notice किया — और वापस लाया। फिर पाँच seconds में किसी रिश्तेदार की याद आ गई। वापस लाया। फिर कोई पुरानी बात याद आ गई। वापस लाया। यह loop 20 मिनट की sitting में 200 बार हो सकता है — और यह बिल्कुल normal है। यही है यतो यतो निश्चलति... ततः ततः नियम्य

रोज़ की ज़िंदगी में यह दिखता है — जब conversation में हो और मन किसी और चीज़ पर चला जाए — और आप खुद को notice करके वापस present हो जाएं। या जब काम करते हुए मन distract हो जाए और आप उसे वापस task पर लाएं। यह micro-meditations — ये सब उसी practice का हिस्सा हैं।

और सबसे important — जब कोई दुखद, तकलीफदेह विचार आए — और मन उसमें डूबने लगे — उस moment में यतो यतो निश्चलति ततः ततः नियम्य याद करो। वह विचार कहाँ जा रहा है — notice करो — और गently वापस लाओ। यह practice है।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: मन बहुत ज़्यादा भटकता है — क्या यह मेरी कोई special problem है?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — नहीं। कृष्ण ने खुद मन को चंचल और अस्थिर कहा है। यह हर इंसान का मन है। जो आपको special problem लग रही है — वह actually normal human mind है। आप alone नहीं हैं।

सवाल: हर बार वापस लाने पर भी मन फिर भटकता है — progress कब होगी?

स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — progress हो रही है, आपको दिख नहीं रही। जैसे exercise के results धीरे दिखते हैं — वैसे ही mental training के results धीरे दिखते हैं। पर वे आ रहे हैं। हर "वापस लाना" एक investment है।

सवाल: गुस्से से मन को वापस लाएं या प्यार से?

प्रभुपाद जी कहते हैं — प्यार से। गुस्से से वापस लाने पर tension बढ़ती है जो ध्यान को और कठिन बनाती है। एक gentle, patient redirection — जैसे एक छोटे बच्चे को प्यार से बुलाते हैं — यह ज़्यादा effective है।

सवाल: क्या हर thought को रोकना ज़रूरी है — या कुछ thoughts ठीक हैं?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — ध्यान के समय, लक्ष्य है आत्मा में टिकना। जो भी विचार उससे दूर ले जाए — उसे वापस लाओ। भगवान के विचार, अच्छे विचार भी अगर ध्यान को distract कर रहे हों — उन्हें भी gentle रखो। ध्यान के बाद सब सोच सकते हो।

सवाल: 6.25 और 6.26 मिलकर क्या सिखाते हैं?

6.25 ने बताया — धीरे-धीरे, patience के साथ मन को settle करो। 6.26 बताता है — जब मन settle नहीं होता, भटकता है — तो क्या करो। वापस लाओ। हर बार। दोनों मिलकर एक complete picture देते हैं — patience के साथ आगे बढ़ो, और जब भी मन भटके, bina frustrate hue वापस लाओ।

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https://krishnbhakti.com/hindi-blogs/gita-shloka-6-25-dhire-dhire-man-ko-shant-karo

🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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