पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया था कि योग की यात्रा में दो अवस्थाएं होती हैं — आरुरुक्षु और योगारूढ़। पर एक सवाल मन में उठता है — कैसे पता चलेगा कि मैं योगारूढ़ हो गया हूँ? कोई certificate तो मिलता नहीं। कोई घंटी नहीं बजती। तो पहचान कैसे होगी?
इस श्लोक में कृष्ण वही पहचान बताते हैं। और यह पहचान बाहरी नहीं है — यह पूरी तरह अंदरूनी है। यह इस बात पर नहीं कि आप कितने घंटे ध्यान करते हैं, कितनी बार मंदिर जाते हैं, या कितने शास्त्र याद हैं। यह इस बात पर है कि आपका मन कहाँ टिका है।
यह श्लोक उन सबके लिए एक आईना है जो खुद से पूछते हैं — "मैं कहाँ हूँ इस रास्ते पर?"
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ६.४ ॥
सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?
श्रीकृष्ण कहते हैं — जब इंसान न इंद्रियों के विषयों में आसक्त रहता है, न कर्मों में — और जब वह सभी संकल्पों का सन्यासी हो जाता है — तब उसे योगारूढ़ कहा जाता है।
तीन चीज़ें यहाँ महत्वपूर्ण हैं। पहली — इंद्रियार्थेषु न आसक्ति — इंद्रियों के विषयों में आसक्ति नहीं। दूसरी — कर्मसु न आसक्ति — कर्मों में भी आसक्ति नहीं। तीसरी — सर्वसंकल्पसन्यासी — सभी संकल्पों का त्याग। जब ये तीनों हों — तभी योगारूढ़।
साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि
स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर बहुत गहरी बात कहते हैं। वे इंद्रियार्थेषु न आसक्ति को समझाते हुए कहते हैं — यह इंद्रियों का उपयोग न करना नहीं है। योगारूढ़ इंसान भी खाता है, देखता है, सुनता है। पर वह इन विषयों में डूबता नहीं। जैसे कमल पानी में रहता है पर भीगता नहीं — वैसे ही योगारूढ़ दुनिया में रहता है पर उसमें फँसता नहीं।
वे कर्मसु न आसक्ति पर कहते हैं — यह बड़ी सूक्ष्म बात है। कर्म करना और कर्म में आसक्त होना — दोनों अलग हैं। आसक्ति का मतलब है — "यह काम मेरे कारण हो रहा है, यह मेरी उपलब्धि है।" जब यह "मेरा" भाव जाता है — तो कर्म तो होता है पर आसक्ति नहीं रहती।
सर्वसंकल्पसन्यासी पर स्वामी जी कहते हैं — यह 6.2 की बात का पूर्ण रूप है। वहाँ कहा था कि संकल्पों का त्याग करना होगा। यहाँ बताया कि जब वह त्याग पूरा हो जाता है — तब योगारूढ़ की अवस्था आती है। यह एक ही रात में नहीं होता — यह वर्षों की साधना का फल है।
प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़
श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में कहते हैं कि यह श्लोक योगारूढ़ की एक बहुत सटीक परिभाषा देता है। वे कहते हैं — इंद्रियों के विषयों में आसक्ति न होना और कर्मों में आसक्ति न होना — यह दोनों मिलकर एक ऐसी अवस्था बनाते हैं जहाँ इंसान पूरी तरह स्वतंत्र हो जाता है।
प्रभुपाद जी कहते हैं कि सर्वसंकल्पसन्यासी वह है जिसके मन में "मुझे यह चाहिए" वाली कोई आवाज़ नहीं उठती। यह इच्छाओं का पूर्ण अभाव नहीं है — यह इच्छाओं की पकड़ का अभाव है। जब कोई इच्छा मन को नहीं खींचती — तब मन पूरी तरह परमात्मा में टिक सकता है।
वे भक्तियोग के संदर्भ में कहते हैं — जो भक्त कृष्ण में पूरी तरह लीन है, उसके लिए यह अवस्था स्वाभाविक रूप से आती है। उसे अलग से संकल्पों को हटाने की कोशिश नहीं करनी पड़ती — कृष्ण का आकर्षण ही बाकी सब को फीका कर देता है।
स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या
स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज के context में बहुत सुंदर तरीके से समझाते हैं। वे कहते हैं — आज हम सबकी ज़िंदगी में दो चीज़ें सबसे ज़्यादा energy लेती हैं। पहली — इंद्रियों की भूख। स्वादिष्ट खाना, entertainment, social media, comfort — इन सबमें मन डूबा रहता है। दूसरी — अपने कामों में अहंकार। "मैंने यह किया", "मेरी वजह से हुआ", "मुझे credit मिलना चाहिए।"
वे कहते हैं — जब इन दोनों से मुक्ति मिल जाए — तो एक अद्भुत हल्कापन आता है। जीवन में सब कुछ वैसा ही रहता है — पर बोझ नहीं रहता। यही है योगारूढ़ की अवस्था।
स्वामी जी एक practical बात कहते हैं — वे कहते हैं कि यह अवस्था एकदम से नहीं आती। पर इसके छोटे-छोटे अनुभव रोज़ की ज़िंदगी में आते हैं। जब आप कोई काम करके उसका श्रेय किसी और को दे देते हैं — एक पल के लिए वह हल्कापन आता है। जब आप किसी मिठाई को देखकर भी उसकी तरफ नहीं खिंचते — वह भी उसी अवस्था की एक झलक है।
असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?
सोचिए एक doctor को जो रात को emergency में उठकर जाता है — बिना किसी शिकायत के, बिना इस सोच के कि "extra पैसे मिलेंगे या नहीं।" बस जाता है क्योंकि यह उसका काम है। और जब मरीज़ ठीक हो जाता है — तो उसे credit की ज़रूरत नहीं। यह है कर्म में आसक्ति का न होना।
या सोचिए एक माँ को — जो दिनभर घर के काम करती है, बच्चों का ख्याल रखती है — बिना यह सोचे कि "कोई तारीफ करेगा या नहीं।" और शाम को जब थकी हुई बैठती है — तो मन में कोई कड़वाहट नहीं। यह है इंद्रियों और कर्मों में आसक्ति का धीरे-धीरे कम होना।
और सबसे छोटा उदाहरण — जब कोई आपकी तारीफ करे और आप खुश न हों, और जब कोई बुराई करे और आप दुखी न हों — तब समझो कि योगारूढ़ की दिशा में एक कदम बढ़ा।
मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे
सवाल: क्या योगारूढ़ इंसान कुछ महसूस नहीं करता — क्या वह पत्थर जैसा हो जाता है?
बिल्कुल नहीं। स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — योगारूढ़ इंसान सबसे ज़्यादा जीवंत होता है। वह महसूस करता है — पर महसूस करने में डूबता नहीं। जैसे एक कुशल तैराक पानी में पूरी तरह होता है — पर डूबता नहीं।
सवाल: सर्वसंकल्पसन्यासी — क्या सभी सपने और लक्ष्य छोड़ने होंगे?
स्वामी रामसुखदास जी स्पष्ट करते हैं — सपने और लक्ष्य रखना ठीक है। पर उन पर इतना अटक जाना कि उनके बिना जीना मुश्किल हो जाए — यह संकल्प की पकड़ है। उसे छोड़ना है — लक्ष्य को नहीं।
सवाल: क्या यह अवस्था इस जीवन में मिल सकती है?
प्रभुपाद जी कहते हैं — हाँ। यह कोई मृत्यु के बाद की बात नहीं। जो साधक सच्चे मन से भक्ति और कर्मयोग की साधना करता है — उसके लिए यह अवस्था इसी जीवन में सम्भव है।
सवाल: कर्म में आसक्ति न होना — क्या इसका मतलब है कि काम में मन न लगाएं?
उल्टा। स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — आसक्ति के बिना काम और बेहतर होता है। जब डर नहीं, जब credit की चिंता नहीं — तो पूरी energy काम में लगती है। योगारूढ़ इंसान सबसे focused होता है।
सवाल: 6.3 और 6.4 मिलकर क्या कहते हैं?
6.3 ने बताया — योग पर चढ़ने के लिए कर्म साधन है। 6.4 बताता है — जब वह कर्म पूर्ण रूप से आसक्ति रहित हो जाए और सभी संकल्प छूट जाएं — तब योगारूढ़ की अवस्था आती है। एक यात्रा की शुरुआत और उसकी मंजिल।
Read this: योग की शुरुआत कर्म से होती है, मंजिल शांति से — जानो कैसे..
https://krishnbhakti.com/hindi-blogs/gita-shloka-6-3-yogarudha-kaise-bane
🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏