भगवद गीता 6.7 — जिसने मन जीत लिया, उसके लिए सर्दी-गर्मी, मान-अपमान सब बराबर हो जाते हैं

Published: 7 जून 2026 भगवद गीता 6.7 — जिसने मन जीत लिया, उसके लिए सर्दी-गर्मी, मान-अपमान सब बराबर हो जाते हैं 🇺🇸 Read in English

पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया था कि जीता हुआ मन मित्र है और न जीता हुआ मन शत्रु। पर अब एक स्वाभाविक सवाल उठता है — ठीक है, मान लिया कि मन जीत लिया। तो फिर उस इंसान की ज़िंदगी कैसी दिखती है? क्या फर्क आता है? क्या बदलता है उसमें?

यह श्लोक उसी का जवाब है। यह एक portrait है — एक ऐसे इंसान का जिसने अपने मन को साध लिया है। और यह portrait बहुत ही असाधारण है। क्योंकि इस इंसान के लिए ठंड और गर्मी एक है। सुख और दुख एक है। तारीफ और बुराई एक है। यह सुनकर लगता है — यह तो कोई पत्थर होगा! पर नहीं — यह सबसे ज़्यादा जीवंत इंसान है।

यह श्लोक आज के उस इंसान से बात करता है जो हर छोटी बात से हिल जाता है — मौसम बदला तो परेशान, किसी ने कुछ कहा तो परेशान, कुछ नहीं मिला तो परेशान। कृष्ण कह रहे हैं — एक ऐसी अवस्था है जहाँ यह सब हिलाता नहीं।

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।

शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ६.७ ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — जिसने मन और इंद्रियों को जीत लिया है और जो पूरी तरह शांत है — उसके लिए परमात्मा सदा समाहित यानी प्रकट रहता है। सर्दी-गर्मी में, सुख-दुख में, मान और अपमान में — वह समभाव से रहता है।

यहाँ तीन जोड़े हैं — शीत-उष्ण यानी शारीरिक कष्ट और आराम, सुख-दुख यानी मानसिक अनुभव, और मान-अपमान यानी सामाजिक स्थिति। इन तीनों में जो समभाव रखे — उसके लिए परमात्मा सदा उपलब्ध है।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर कहते हैं कि जितात्मा — जिसने आत्मा यानी मन को जीत लिया — और प्रशांत — जो पूरी तरह शांत है — ये दोनों एक दूसरे के कारण हैं। जब मन जीता जाता है तो शांति आती है। और जब शांति होती है तो मन और गहरा साधता है।

वे शीतोष्ण — सर्दी-गर्मी — पर कहते हैं कि यह केवल मौसम की बात नहीं है। यह शारीरिक कष्टों और सुविधाओं की बात है। जिसका मन जीता हुआ है — उसे शरीर की तकलीफें उतना नहीं हिलातीं। वह बीमारी में भी शांत रह सकता है, थकान में भी।

मानापमान — मान और अपमान — पर स्वामी जी बहुत सुंदर बात कहते हैं। वे कहते हैं — आज के इंसान की सबसे बड़ी कमज़ोरी यही है। तारीफ मिली तो फूल गए, बुराई हुई तो मुरझा गए। यह मन का न जीता होना है। जिसका मन जीता है — वह तारीफ से नहीं फूलता और बुराई से नहीं टूटता। दोनों में एक जैसा रहता है।

और सबसे महत्वपूर्ण — परमात्मा समाहितः — ऐसे इंसान के लिए परमात्मा सदा प्रकट रहता है। स्वामी जी कहते हैं — परमात्मा तो सबके अंदर हैं। पर वे तभी "दिखते" हैं जब मन शांत और साधा हुआ हो। जैसे पानी में चाँद का प्रतिबिंब तभी दिखता है जब पानी स्थिर हो।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि यहाँ कृष्ण एक बहुत ज़रूरी बात बता रहे हैं — परमात्मा की अनुभूति के लिए मन का शांत और साधा हुआ होना ज़रूरी है। जब तक मन में उथल-पुथल है — परमात्मा का अनुभव नहीं हो सकता।

वे समाहितः — समाहित यानी स्थिर रूप से प्रकट — पर कहते हैं कि यह बहुत गहरा शब्द है। इसका मतलब है कि परमात्मा उस इंसान के जीवन में हर पल उपस्थित रहते हैं — न केवल ध्यान के समय, बल्कि काम करते समय, खाते समय, बात करते समय भी।

प्रभुपाद जी तीनों जोड़ों — शीत-उष्ण, सुख-दुख, मान-अपमान — पर कहते हैं कि यह समभाव इंद्रियों को मारने से नहीं आता। यह आता है जब इंसान को यह पता हो जाए कि मैं देह नहीं हूँ। जब यह ज्ञान पक्का हो — तो शरीर को जो लगता है वह आत्मा को नहीं हिलाता।

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज के social media युग से जोड़ते हैं। वे कहते हैं — आज हम सब एक अजीब खेल में फँसे हैं। हम post करते हैं और likes देखते हैं। कोई तारीफ करे तो मन खुश, कोई आलोचना करे तो मन दुखी। यह मानापमान की गुलामी है — और यह सबसे बड़ी mental prison है।

वे कहते हैं — जिसका मन जीता हुआ है, वह तारीफ सुनकर खुश नहीं होता इसलिए नहीं कि वह ठंडा है — बल्कि इसलिए कि उसकी खुशी पहले से ही पूर्ण है। उसे बाहर से कुछ add करने की ज़रूरत नहीं। और यही है असली freedom।

स्वामी जी परमात्मा समाहितः पर कहते हैं — यह सबसे बड़ा reward है। जब मन शांत हो जाता है तो एक अजीब सी उपस्थिति महसूस होती है — एक भरापन, एक warmth। यही परमात्मा का अनुभव है। और यह केवल उन्हीं को मिलता है जिनका मन साधा हुआ हो।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

सोचिए एक doctor को — जो तीन दिन से ठीक से सोया नहीं है, बहुत थका हुआ है — पर अपने काम में उतना ही present है। शरीर थका है पर मन हिला नहीं। यह है शीत-उष्ण में समभाव।

या सोचिए किसी ऐसे इंसान को — जिसके जीवन में अचानक बड़ी तकलीफ आई — कोई करीबी बीमार पड़ गया, या कोई बड़ा नुकसान हुआ। दुख है — पर वह टूटा नहीं। दुख को महसूस किया, रोया भी शायद — पर अंदर से एक धागा था जो नहीं टूटा। यह है सुख-दुख में समभाव।

और मान-अपमान? सोचिए उस इंसान को जिसे meeting में सबके सामने गलत कहा गया। पर उसने शांत रहकर अपनी बात रखी — न defensive हुआ, न aggressive। बाद में घर आकर उस बात को भूल गया। यह है मान-अपमान में समभाव।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: क्या समभाव का मतलब है कि कुछ feel न करें — emotions बंद कर दें?

बिल्कुल नहीं। स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — समभाव का मतलब emotions न होना नहीं है। मतलब है — emotions आएं और जाएं, पर आप उनमें बह न जाएं। जैसे नाव पानी में रहती है पर पानी नाव में नहीं आता।

सवाल: तारीफ से खुश न होना — क्या यह abnormal नहीं है?

प्रभुपाद जी कहते हैं — यह abnormal नहीं, यह असली normal है। हम तारीफ पर इतना depend करते हैं क्योंकि अंदर से अधूरे हैं। जब अंदर पूर्णता हो — तो बाहर की तारीफ की ज़रूरत नहीं रहती।

सवाल: परमात्मा समाहितः — क्या इसका मतलब है कि ऐसा इंसान हमेशा ध्यान में रहता है?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — नहीं। इसका मतलब है कि परमात्मा उसके हर काम में, हर पल में उपस्थित हैं। वह ध्यान में बैठे या बाज़ार में हो — परमात्मा की अनुभूति उसे छोड़ती नहीं।

सवाल: यह समभाव धीरे-धीरे आता है या एकदम से?

स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — धीरे-धीरे। पहले बड़ी बातें हिलाना बंद करती हैं, फिर छोटी बातें। एक दिन आता है जब कुछ भी उतना नहीं हिलाता। यह साधना का natural फल है।

सवाल: 6.6 और 6.7 मिलकर क्या सिखाते हैं?

6.6 ने बताया — जीता हुआ मन मित्र है। 6.7 बताता है — वह मित्र बना हुआ मन कैसा दिखता है। वह इंसान सर्दी-गर्मी, सुख-दुख, मान-अपमान में एक जैसा रहता है — और उसके लिए परमात्मा सदा उपलब्ध है। यह जीते हुए मन का सबसे बड़ा फल है।

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🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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