भगवद गीता 6.9 — दोस्त हो या दुश्मन, अपना हो या पराया — जो सबको एक नज़र से देखे, वही सबसे बड़ा योगी है

Published: 10 जून 2026 भगवद गीता 6.9 — दोस्त हो या दुश्मन, अपना हो या पराया — जो सबको एक नज़र से देखे, वही सबसे बड़ा योगी है 🇺🇸 Read in English

एक सच्चाई है जो हम सब जानते हैं पर मानना मुश्किल लगता है — हम सबके साथ एक जैसा व्यवहार नहीं करते। जो हमारा दोस्त है उसके साथ अलग, जो दुश्मन है उसके साथ अलग। जो हमारे काम आया उसके साथ नरम, जो नहीं आया उसके साथ कठोर। यह स्वाभाविक है — पर क्या यह सही है? क्या इससे परे जाना सम्भव है?

इस श्लोक में कृष्ण एक ऐसे इंसान की बात करते हैं जो इससे परे चला गया है। जो दोस्त को और दुश्मन को एक नज़र से देखता है। जो अपनों को और परायों को एक भाव से देखता है। यह कोई कल्पना नहीं है — यह साधना का सबसे ऊँचा फल है।

और यह श्लोक आज के उस इंसान से बात करता है जो रिश्तों में थका हुआ है — जो हर रिश्ते में हिसाब रखता है, जो हर व्यवहार को याद रखता है, जो माफ नहीं कर पाता। कृष्ण कह रहे हैं — एक ऐसी अवस्था है जहाँ यह सब बोझ नहीं रहता।

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।

साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ६.९ ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — जो सुहृद यानी शुभचिंतक, मित्र, शत्रु, उदासीन यानी तटस्थ, मध्यस्थ यानी बीच वाले, द्वेषी और बंधु — और साधु तथा पापी — सबके प्रति समान बुद्धि रखता है — वह सबसे श्रेष्ठ है।

यहाँ सात तरह के लोगों का उल्लेख है। सुहृद — जो बिना स्वार्थ के भला चाहे। मित्र — जो दोस्त हो। अरि — जो दुश्मन हो। उदासीन — जो तटस्थ हो। मध्यस्थ — जो बीच में हो। द्वेषी — जो द्वेष रखे। बंधु — जो रिश्तेदार हो। इन सबके साथ समान बुद्धि — यही श्रेष्ठता है।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि यहाँ समबुद्धि का मतलब यह नहीं है कि सबके साथ एक जैसा व्यवहार करो। एक डॉक्टर और एक पड़ोसी के साथ व्यवहार तो अलग होगा। पर भाव — अंदर का रवैया — एक होना चाहिए। दोनों के प्रति प्रेम, दोनों का भला चाहना।

वे साधुष्वपि च पापेषु — साधुओं और पापियों में भी समबुद्धि — पर बहुत गहरी बात कहते हैं। वे कहते हैं — साधु के साथ समभाव रखना आसान है। पर पापी के साथ? जिसने गलत किया, जिसने नुकसान पहुँचाया — उसके साथ भी समभाव? यही सबसे कठिन परीक्षा है। और यही सबसे बड़ी साधना है।

स्वामी जी कहते हैं — समभाव का मतलब यह नहीं कि गलत को सही मान लो। एक पापी के काम की निंदा हो सकती है — पर उसकी आत्मा के प्रति घृणा नहीं होनी चाहिए। हर आत्मा में परमात्मा है — यह भाव जब पक्का हो जाए, तब समभाव स्वाभाविक हो जाता है।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि यह समभाव केवल एक मानसिक अभ्यास नहीं है — यह आत्मज्ञान का स्वाभाविक फल है। जब इंसान को यह पता हो जाए कि हर जीव में परमात्मा का अंश है — तो दुश्मन और दोस्त में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि दोनों में एक ही चेतना है।

प्रभुपाद जी विशिष्यते — सबसे श्रेष्ठ — पर ज़ोर देते हैं। वे कहते हैं — कृष्ण यहाँ बहुत स्पष्ट कह रहे हैं कि सबके प्रति समभाव रखने वाला सबसे ऊँची अवस्था में है। यह कोई ordinary achievement नहीं — यह spiritual life का एक बड़ा मील का पत्थर है।

वे यह भी कहते हैं कि भक्त के लिए यह समभाव इसलिए आता है क्योंकि वह हर जगह कृष्ण को देखता है। जब आप हर इंसान में कृष्ण का अंश देखें — तो दुश्मनी कैसे रहेगी? घृणा कैसे रहेगी? यही भक्तिभाव का सबसे practical manifestation है।

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज के broken relationships की दुनिया से जोड़ते हैं। वे कहते हैं — आज हर किसी के जीवन में कोई न कोई ऐसा इंसान है जिसके बारे में सोचते ही मन भारी हो जाता है। कोई जिसने धोखा दिया, कोई जिसने नुकसान पहुँचाया, कोई जो बिना कारण दुश्मन बन गया। और हम उस भारीपन को वर्षों तक ढोते रहते हैं।

वे कहते हैं — यह श्लोक उस भारीपन को नाम देता है और उससे मुक्ति का रास्ता बताता है। समबुद्धि — समान बुद्धि — यानी हर इंसान को उसकी आत्मा की दृष्टि से देखना, न उसके व्यवहार की दृष्टि से। उसका व्यवहार गलत हो सकता है — पर उसकी आत्मा में वही परमात्मा है जो मेरी आत्मा में है।

स्वामी जी एक बहुत important बात कहते हैं — वे कहते हैं कि माफ करना कमज़ोरी नहीं है — यह सबसे बड़ी ताकत है। जब आप किसी दुश्मन को माफ करते हैं — तो आप उसके लिए नहीं, अपने लिए करते हैं। वह बोझ जो आप वर्षों से ढो रहे थे — वह उतर जाता है। यही है समबुद्धि का practical फायदा।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

सोचिए office में एक ऐसे colleague को जिसने एक बार आपकी पीठ पीछे कुछ कहा था। आप जानते हैं। और हर बार जब वह सामने आता है — मन में एक कड़वाहट उठती है। यह है द्वेषी के प्रति असमभाव। पर जो इंसान उस कड़वाहट को धीरे-धीरे छोड़ दे — उसके सामने भी उतनी ही सहजता से जाए जितनी दोस्त के सामने — वह इस श्लोक को जी रहा है।

या family में — जहाँ कुछ रिश्ते बहुत अच्छे हैं और कुछ में तनाव है। जो इंसान हर रिश्ते में — चाहे करीबी हो या दूर, चाहे जिसने कभी तकलीफ दी हो — एक जैसी गर्मजोशी और सम्मान दे सके — वह इस श्लोक को समझ चुका है।

और सबसे कठिन — साधु और पापी में समभाव। जब आप किसी ऐसे इंसान को देखें जिसने कुछ बुरा किया है — और आपके मन में घृणा की जगह एक दुख हो, एक compassion हो कि "यह इंसान भटका हुआ है" — तब आप उस समभाव की दिशा में हैं।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: दुश्मन के साथ समभाव — क्या यह practically सम्भव है?

स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — सम्भव है, पर एक दिन में नहीं। पहले उस इंसान के बारे में बुरा न सोचने का अभ्यास करो। फिर उसके लिए मन में भला चाहने का। यह धीरे-धीरे होता है — पर होता है।

सवाल: समभाव का मतलब क्या सबको एक जैसा treat करना है?

स्वामी रामसुखदास जी स्पष्ट करते हैं — बाहरी व्यवहार में situation के अनुसार फर्क होगा। पर अंदर का भाव — प्रेम, सम्मान, भलाई — सबके लिए एक होना चाहिए। यह बाहर का नहीं, अंदर का काम है।

सवाल: पापी के साथ समभाव — क्या इसका मतलब उसके पाप को माफ करना है?

प्रभुपाद जी कहते हैं — नहीं। पाप की निंदा हो सकती है और होनी चाहिए। पर पापी की आत्मा से घृणा नहीं होनी चाहिए। काम गलत था — पर उसमें भी वही आत्मा है जो मुझमें है। यह distinction बहुत ज़रूरी है।

सवाल: क्या यह समभाव आना ज़रूरी है — क्या बिना इसके योगी नहीं बन सकते?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — यह योग की उच्चतम अवस्था का लक्षण है। हर साधक को इसकी दिशा में चलना चाहिए — भले ही वहाँ पहुँचने में समय लगे। दिशा सही हो — मंजिल मिलती है।

सवाल: 6.8 और 6.9 मिलकर क्या सिखाते हैं?

6.8 ने बताया — युक्त योगी की पहचान क्या है — ज्ञान-विज्ञान से तृप्त, अचल, इंद्रियजित, सोना-मिट्टी एक। 6.9 उसी description को और आगे ले जाता है — ऐसा इंसान न केवल चीज़ों में समभाव रखता है, बल्कि लोगों में भी। दोस्त, दुश्मन, साधु, पापी — सब एक। यही योग की पूर्णता है।

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🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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