क्या कृष्ण हमसे छिपे हुए हैं? माया का असली सच जानिए 🧘‍♂️

प्रकाशित: 30 अगस्त 2026 क्या कृष्ण हमसे छिपे हुए हैं? माया का असली सच जानिए 🧘‍♂️ Read in English

पिछले श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने उन लोगों की बात की थी जो उन्हें अव्यक्त (बिना रूप वाले) से व्यक्त (रूप वाले) में आने वाला एक साधारण मनुष्य मानते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि कृष्ण का दिव्य स्वभाव क्या है। आज हम 7.25 श्लोक पर चर्चा करेंगे, जो यह बताता है कि क्यों हर कोई उन्हें नहीं देख पाता। अक्सर हम शिकायत करते हैं, 'भगवान, मैं आपको ढूँढ रहा हूँ, पर आप मुझे दर्शन क्यों नहीं देते?' हम सोचते हैं कि भगवान शायद कहीं दूर छिपे बैठे हैं, या शायद वे हमसे नाराज हैं। लेकिन कृष्ण यहाँ एक ऐसी सच्चाई का पर्दा उठाते हैं जो आपके पूरे जीवन के नजरिए को बदल देगी।

आप ऑफिस की भागदौड़ में उलझे हैं, सोशल मीडिया पर दूसरों की 'परफेक्ट' लाइफ देखकर खुद को छोटा महसूस कर रहे हैं, और मन में बार-बार ये सवाल उठता है कि क्या वाकई कोई शक्ति है जो हमें देख रही है? हमें लगता है कि भगवान पर्दे के पीछे खड़े होकर तमाशा देख रहे हैं। हम उन्हें पाना चाहते हैं, लेकिन हमारे सामने एक धुंध सी है। क्या वो धुंध भगवान ने बनाई है, या हमने खुद? कृष्ण कहते हैं कि सत्य हमारे सामने ही है, लेकिन हमारी अपनी 'माया' की चश्मा उस सत्य को धुंधला कर रही है।

लोग सोचते हैं कि ध्यान में बैठने का मतलब है भगवान को अपने सामने प्रकट करना। यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। भगवान तो हमेशा प्रकट हैं। आप जिस हवा में सांस ले रहे हैं, वो उनकी शक्ति है। आप जो सोच रहे हैं, वो उनकी चेतना है। फिर भी हमें वो नहीं दिखते। क्यों? क्योंकि हम 'योगमाया' के प्रभाव में हैं। हम भौतिक चीजों में इतने खोए हैं कि हमारी दृष्टि सिर्फ शरीर और सांसारिक सफलताओं तक सीमित हो गई है। कृष्ण यहाँ हमें उस वास्तविकता से रूबरू कराएंगे जो हमें दिखाई नहीं देती, पर जो हर पल हमारे अस्तित्व का आधार है।

इस श्लोक को पढ़ने से पहले, अपनी उन चिंताओं को थोड़ा शांत होने दें जो आपको बताती हैं कि 'भगवान मुझसे दूर हैं'। नहीं, वे दूर नहीं हैं। वो बस उस माया के आवरण में छिपे हैं जिसे हम अपनी इच्छाओं और अहंकार से बुना करते हैं। जब आप इस श्लोक को गहराई से समझेंगे, तो आपको समझ आएगा कि आपकी लाइफ की सबसे बड़ी समस्या 'दूरी' नहीं, बल्कि आपकी 'दृष्टि' है। चलिए, भगवान के शब्दों के माध्यम से इस माया के जाल को खोलते हैं और देखते हैं कि कृष्ण क्या कहते हैं।

क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही कमरे में दो लोग बैठें हों, एक दुखी है और दूसरा शांत—दोनों के सामने वही संसार है, फिर भी अनुभव अलग क्यों है? इसका जवाब कृष्ण के इस श्लोक में है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक मार्ग का मतलब 'भगवान को खोजना' नहीं, बल्कि 'अपनी अज्ञानता के परदे को हटाना' है। आइए, इस दिव्य ज्ञान के सागर में डुबकी लगाते हैं और अपनी चेतना को ऊपर उठाते हैं।

॥ ७.२५ ॥
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः |
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ||

सरल अर्थ:
नाहं प्रकाशः सर्वस्य — मैं सबके लिए प्रकट नहीं हूँ। योगमायासमावृतः — मैं अपनी योगमाया से ढका हुआ हूँ। मूढोऽयं — यह मूर्ख (अज्ञानी) संसार। नाभिजानाति — मुझे नहीं जान पाता। लोको मामजमव्ययम् — यह संसार मुझे जन्मरहित और अविनाशी नहीं जान पाता।

कृष्ण कह रहे हैं कि वे अपनी 'योगमाया' के कारण सबके सामने प्रकट नहीं होते। इसका मतलब यह नहीं है कि वे कहीं छिपे हैं। इसका मतलब यह है कि हमारी बुद्धि भौतिक सुखों और मोह में इतनी फंस गई है कि हम उनके दिव्य, अविनाशी रूप को देखने में असमर्थ हैं। भगवान स्वयं को अपनी माया के परदे के पीछे रखते हैं ताकि हम अपनी इच्छाओं के अनुसार अपना कर्म करें। यदि वे सबके सामने प्रकट हो जाएं, तो इंसान का स्वतंत्र निर्णय (free will) खत्म हो जाएगा।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि 'योगमाया' भगवान की अपनी शक्ति है। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जो कृष्ण को मजबूर कर रही है। यह उनकी एक लीला है। वे नहीं चाहते कि कोई उन्हें बस 'देख' ले और भक्त बन जाए। वे चाहते हैं कि हम उन्हें अपनी भक्ति, अपने विवेक और अपने प्रेम से खोजें। जब आप पूरी निष्ठा से उनकी शरण में जाते हैं, तो वही माया, जो आपको उनसे दूर रख रही थी, खुद-ब-खुद हट जाती है और भगवान आपको दर्शन देते हैं।

स्वामी रामसुखदास जी: स्वामी जी कहते हैं कि 'योगमायासमावृतः' का अर्थ है कि भगवान ने खुद को अपनी योगमाया से ढका हुआ है। स्वामी जी जोर देते हैं कि भगवान किसी की पहुंच से बाहर नहीं हैं, वे तो हर जगह हैं। लेकिन मनुष्य उन्हें इसलिए नहीं देख पाता क्योंकि उसकी दृष्टि 'माया' यानी संसार के भोगों पर अटकी है। स्वामी जी का कहना है कि जैसे बादल सूरज को ढंक लेते हैं, वैसे ही हमारे सांसारिक लगाव भगवान को ढंक लेते हैं। सूरज को बादल नहीं छिपाते, हमारी आँखों के सामने आने वाले बादल हमें सूरज को देखने से रोकते हैं।

स्वामी जी समझाते हैं कि भगवान 'अज' (जन्म न लेने वाले) और 'अव्यय' (जो कभी नष्ट नहीं होता) हैं। हम उन्हें इंसान के रूप में देखते हैं, इसलिए हम उन्हें समझ नहीं पाते। स्वामी जी का मार्गदर्शन है कि अगर आप भगवान को जानना चाहते हैं, तो 'मूढ़ता' को छोड़िए। मूढ़ता क्या है? यह मानना कि यह शरीर मैं हूँ और यह संसार मेरा है। जब आप इस देह-अहंकार को त्यागेंगे, तो वही योगमाया का पर्दा हट जाएगा। वे कहते हैं, 'एव' का अर्थ है कि केवल योगमाया के हटने से ही भगवान के वास्तविक रूप का दर्शन होगा।

ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद: प्रभुपादजी इस श्लोक को पूर्ण भक्ति के नजरिए से देखते हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण को समझना कोई दिमागी कसरत नहीं है। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति भौतिकता में डूबा है, उसे कृष्ण कभी नहीं दिखेंगे। प्रभुपादजी का स्पष्ट मानना है कि भगवान की योगमाया बहुत शक्तिशाली है। इसे पार करने का एकमात्र तरीका 'कृष्ण भावनामृत' है। वे कहते हैं कि जब आप भगवान के लिए सेवा भाव रखते हैं, तो भगवान खुद अपनी माया को हटा देते हैं।

प्रभुपादजी समझाते हैं कि भगवान का शरीर भौतिक नहीं, दिव्य है। वे कहते हैं, 'कृष्ण अपने धाम में हमेशा लीला कर रहे हैं, लेकिन जो मूर्ख हैं, वे उन्हें एक साधारण मनुष्य मान लेते हैं।' प्रभुपादजी के अनुसार, कृष्ण की माया उन लोगों के लिए दीवार की तरह है जो केवल अपनी इन्द्रियों की तृप्ति चाहते हैं। जो भक्त कृष्ण को केंद्र में रखता है, उसके लिए योगमाया एक सुरक्षा कवच बन जाती है जो उसे भौतिक दुख से बचाती है। उनका दृष्टिकोण यह है कि भगवान को खोजने की कोशिश मत करो, भगवान की सेवा करो, वे खुद तुम्हें खोज लेंगे।

स्वामी मुकुंदानंद जी: स्वामी मुकुंदानंद जी इस श्लोक को आधुनिक जीवन से जोड़ते हुए कहते हैं कि हम 'माया' की चक्की में पिस रहे हैं। वे एक बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं: जैसे एक थिएटर में फिल्म चल रही होती है, और हम फिल्म के किरदारों के दुखों में रोने लगते हैं, लेकिन हम भूल जाते हैं कि वो सब पर्दे पर है। भगवान भी इसी माया के परदे के पीछे हैं। स्वामी जी कहते हैं कि 'योगमाया' का मतलब है भगवान की वह शक्ति जो हमें यह भ्रम देती है कि यह संसार ही सब कुछ है।

स्वामी जी युवाओं को सलाह देते हैं कि आपकी एकाग्रता (concentration) ही आपकी शक्ति है। वे कहते हैं कि जब आप मोबाइल पर घंटों स्क्रॉल करते हैं, तो आप अपनी ऊर्जा माया को दे रहे होते हैं। जब आप उस ऊर्जा को ईश्वर की तरफ मोड़ते हैं, तो वह 'योगमाया' जो आपको भगवान से दूर कर रही थी, वही आपको भगवान के करीब ले आने वाली शक्ति (योग) बन जाती है। उनका कहना है कि यह 'रिटर्न जर्नी' है। आत्मा का मन से वापस कृष्ण की ओर जाना ही ध्यान है। वे कहते हैं कि हर बार जब मन भटके और आप उसे वापस लाएं, तो वह एक 'मेंटल रिप' (mental rep) है, जो आपकी आध्यात्मिक मांसपेशियों को मजबूत करता है।

वास्तविक जीवन के उदाहरण:
कल्पना कीजिए कि आप ऑफिस में एक बहुत ही कठिन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। डेडलाइन सिर पर है, बॉस का दबाव है, और आपको लग रहा है कि सब कुछ आपके कंट्रोल से बाहर है। आप चिड़चिड़े हो गए हैं। अचानक, आपको याद आता है कि 'यह तो माया है'। आप एक गहरी सांस लेते हैं और सोचते हैं, 'यह शरीर, यह ऑफिस, यह तनाव—सब अस्थायी है। भगवान तो इसके पीछे हैं।' उस क्षण में, आप उस तनाव से ऊपर उठ जाते हैं। वह प्रोजेक्ट आपका मालिक नहीं, आपकी सेवा का जरिया बन जाता है। यही योगमाया के परदे को थोड़ा सा हटाना है।

एक और उदाहरण लें। सोशल मीडिया पर आप देखते हैं कि कोई दोस्त विदेश घूम रहा है या किसी को बड़ी प्रमोशन मिली है। अचानक अंदर एक जलन और हीन भावना पैदा होती है। आप सोचते हैं, 'भगवान, मुझे ही क्यों पीछे रखा है?' यही वह 'मूढोऽयं' (अज्ञानी) वाली स्थिति है। आप उस माया के जाल में फंस गए हैं जो दिखा रही है कि खुशी बाहर है। जब आप 7.25 को याद करते हैं, तो आप जानते हैं कि वह बाहरी चमक सिर्फ परदा है। असली शांति आपके भीतर कृष्ण में है, जो अविनाशी है।

ध्यान में बैठते समय भी यही होता है। आप आंखें बंद करते हैं और मन भागता है। पहले 5 मिनट आपको लगता है कि भगवान नहीं दिख रहे। आप निराश होते हैं। लेकिन जो साधक समझदार है, वो जानता है कि यही 'योगमाया' है। वह लड़ता नहीं, बस शांति से अपने मन को वापस कृष्ण के नाम या रूप पर लाता है। यह संघर्ष ही कृष्ण तक पहुंचने का रास्ता है। हर बार जब आप मन को वापस लाते हैं, आप माया की दीवार में एक छोटा सा छेद कर देते हैं।

स्वयं से प्रश्न (Self Q&A):
प्रश्न 1: क्या यह मेरी कोई खास प्रॉब्लम है कि मुझे भगवान नहीं दिख रहे?
उत्तर: नहीं, यह सबकी प्रॉब्लम है। स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं कि यह 'योगमाया' का स्वभाव है। आप अकेले नहीं हैं। यह पूरी मानवता का संघर्ष है। जब तक आप 'मैं और मेरा' की भावना से जुड़े हैं, माया आपको भगवान से छिपाकर रखेगी।

प्रश्न 2: क्या मुझे हर वक्त कृष्ण को देखना चाहिए?
उत्तर: नहीं, यह संभव नहीं है। लेकिन आप हर पल उनकी मौजूदगी महसूस कर सकते हैं। प्रभुपादजी कहते हैं कि सेवा के माध्यम से उन्हें हर काम में देखिए। जो आप खा रहे हैं, जो आप काम कर रहे हैं, वो सब भगवान को समर्पित है—यही उन्हें देखना है।

प्रश्न 3: क्या भगवान कभी खुद माया को हटाते हैं?
उत्तर: हाँ, जब भक्त की पुकार सच्ची होती है। स्वामी मुकुंदानंद जी कहते हैं कि भगवान 'कृपालु' हैं। वे प्रतीक्षा करते हैं कि कब आप अपनी मर्जी से उनकी ओर मुड़ेंगे। जैसे ही आप एक कदम बढ़ाते हैं, वे सौ कदम आगे बढ़कर आते हैं।

प्रश्न 4: क्या माया बुरी चीज़ है?
उत्तर: माया बुरी नहीं, यह एक परीक्षा है। यह हमें सिखाती है कि हम किसमें अधिक रुचि लेते हैं। अगर आप संसार में रुचि लेंगे, तो माया संसार दिखाएगी। अगर आप भगवान में रुचि लेंगे, तो वही माया आपको भगवान तक ले जाएगी।

प्रश्न 5: क्या पिछले श्लोक से यह कैसे जुड़ता है?
उत्तर: पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि वे क्या हैं (अव्यय, अज), और यहाँ वे बता रहे हैं कि उन्हें देखना मुश्किल क्यों है। यह एक निरंतर प्रवाह है। पहले ज्ञान, फिर बाधा (माया), और फिर उस बाधा को पार करने का उपाय।

🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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