भगवद गीता 5.26 — काम और क्रोध से मुक्ति ही असली आज़ादी है

Published: 13 मई 2026 भगवद गीता 5.26 — काम और क्रोध से मुक्ति ही असली आज़ादी है 🇺🇸 Read in English

ज़रा सोचिए — आखिरी बार आपको किस बात पर इतना गुस्सा आया था कि आपने कुछ ऐसा कह दिया या कर दिया जिसका बाद में पछतावा हुआ? या कोई ऐसी चाहत थी जिसके पीछे आप इतने भाग गए कि सब कुछ भूल गए — परिवार, नींद, खुद की शांति? यह काम और क्रोध — यही दो चीज़ें हैं जो इंसान की सबसे बड़ी दुश्मन हैं। और यही दो चीज़ें हैं जिनके बारे में श्रीकृष्ण इस श्लोक में बात करते हैं।

हम सब जानते हैं कि गुस्सा बुरा है। हम सब जानते हैं कि हर चीज़ की चाहत रखना दुख देती है। पर जानना और जी पाना — इसमें ज़मीन-आसमान का फर्क है। रात को सोते समय सोचते हैं — "कल से गुस्सा नहीं करूँगा।" और अगले दिन सुबह दस बजे ही किसी बात पर भड़क जाते हैं। यह हमारी कमज़ोरी नहीं है — यह उस साधना की कमी है जिसकी बात गीता करती है।

भगवद गीता के पाँचवें अध्याय के छब्बीसवें श्लोक में श्रीकृष्ण एक बहुत बड़ी बात कहते हैं — और वह बात सिर्फ संन्यासियों के लिए नहीं है। वह बात हर उस इंसान के लिए है जो अपनी ज़िंदगी में सच्ची शांति चाहता है।

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।

अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ ५.२६ ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — जो यती — यानी संयमी साधक — काम और क्रोध से पूरी तरह मुक्त हो गए हैं, जिनका मन वश में है, और जिन्होंने आत्मा को जान लिया है — उन्हें ब्रह्म-निर्वाण यानी परम शांति हर तरफ से, हर समय मिलती रहती है।

यहाँ एक बहुत खास शब्द है — अभितः। इसका मतलब है "चारों तरफ से" या "हर दिशा से।" यानी वह शांति किसी एक पल में नहीं मिलती — वह हमेशा बनी रहती है। सुबह भी, रात भी, अकेले में भी, भीड़ में भी। यही असली ब्रह्म-निर्वाण है।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि काम और क्रोध — ये दोनों एक ही जड़ से निकलते हैं। जब कोई इच्छा पूरी नहीं होती — तब क्रोध जन्म लेता है। और इच्छा का जन्म कहाँ से होता है? जब हम किसी बाहरी चीज़ को अपनी खुशी का स्रोत मान लेते हैं।

स्वामी जी कहते हैं कि यतीनां का अर्थ केवल वह नहीं जिसने घर-परिवार छोड़ दिया। यती वह है जिसने अपनी इंद्रियों और मन को साधने का संकल्प लिया है — चाहे वह गृहस्थ हो या संन्यासी। जो रोज़ थोड़ा-थोड़ा अपने मन को समेटता है — वही यती है।

विदितात्मनाम् — जिन्होंने आत्मा को जाना है — इस पर स्वामी जी विशेष ज़ोर देते हैं। वे कहते हैं कि जब तक इंसान यह नहीं जानता कि "मैं यह शरीर नहीं हूँ, मैं आत्मा हूँ" — तब तक काम और क्रोध से मुक्ति सम्भव नहीं। क्योंकि शरीर की पहचान रहते हुए इच्छाएं स्वाभाविक हैं — और इच्छाओं के रहते काम-क्रोध का आना भी स्वाभाविक है। आत्मज्ञान ही वह नींव है जिस पर यह पूरी साधना टिकती है।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि काम और क्रोध आत्मा के स्वभाव नहीं हैं — ये माया के आवरण हैं। जैसे धूल आईने को ढक लेती है पर आईने का स्वभाव नहीं बन जाती — वैसे ही काम-क्रोध आत्मा पर चढ़े हुए हैं, पर आत्मा का असली स्वरूप शुद्ध, आनंदमय है।

प्रभुपाद जी एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहते हैं — वे कहते हैं कि भक्ति के मार्ग में काम और क्रोध को दबाया नहीं जाता, बल्कि रूपांतरित किया जाता है। काम को कृष्ण की सेवा में लगा दो — वह भक्ति बन जाती है। क्रोध को अधर्म के विरुद्ध लगा दो — वह वीरता बन जाती है। यही है भक्तियोग की शक्ति।

वे अभितः शब्द पर विशेष ध्यान देते हैं और कहते हैं — जो कृष्णभावनामृत में स्थित है, उसके लिए ब्रह्म-निर्वाण कोई भविष्य की उपलब्धि नहीं है। वह अभी, इसी क्षण, इसी जीवन में उपलब्ध है। मृत्यु के बाद का इंतज़ार नहीं — अभी यहाँ।

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को बहुत व्यावहारिक तरीके से समझाते हैं। वे कहते हैं — काम यानी इच्छा अपने आप में बुरी नहीं है। जीना है तो कुछ न कुछ करना होगा — और करने के लिए इच्छा चाहिए। पर जब इच्छा इतनी गहरी हो जाए कि उसके बिना हम खुद को अधूरा महसूस करें — तब वह काम बन जाती है। तब वह बंधन बन जाती है।

स्वामी जी क्रोध के बारे में कहते हैं — क्रोध हमेशा किसी उम्मीद के टूटने से आता है। जब हम किसी से कुछ expect करते हैं और वह पूरा नहीं होता — तब क्रोध आता है। तो क्रोध को जड़ से मिटाना है तो expectations को कम करना होगा — और यह तभी होगा जब हम समझ लें कि असली सुख बाहर नहीं, अंदर है।

वे यतचेतसाम् — मन को वश में करने वालों — के बारे में एक सुंदर बात कहते हैं। वे कहते हैं — मन को वश में करने का मतलब मन को मारना नहीं है। मन को भगवान की तरफ मोड़ना है। जैसे नदी का पानी रोको तो तबाही लाता है — पर उसे सही दिशा में मोड़ो तो खेत सींचता है। मन भी ऐसा ही है।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

आपने कभी notice किया होगा — जब आप किसी चीज़ के बहुत पीछे होते हैं, जैसे कोई promotion, कोई रिश्ता, कोई सपना — और वह नहीं मिलता, तो कितना गुस्सा आता है? उस इंसान पर, उस situation पर, कभी-कभी खुद पर भी। यही है काम से क्रोध का जन्म — जो गीता तीन अध्याय पहले भी कह चुकी है।

पर सोचिए उस इंसान को — जो उस promotion के लिए पूरी मेहनत करता है, पर मन में यह भाव रखता है कि "मैं अपना काम करूँगा — बाकी भगवान की इच्छा।" जब result नहीं आता, तो वह टूटता नहीं। थोड़ी तकलीफ होती है — पर वह तूफान नहीं आता। यही है काम-क्रोध से धीरे-धीरे मुक्त होने की प्रक्रिया।

घर में सोचिए — बच्चा बात नहीं मानता, पति या पत्नी से कोई बात पर मतभेद है, माँ-बाप की कोई उम्मीद पूरी नहीं हो पा रही। यहाँ हर पल काम और क्रोध की परीक्षा होती है। जो इंसान रोज़ थोड़ा-थोड़ा इस परीक्षा में पास होता है — वही धीरे-धीरे उस शांति की तरफ बढ़ता है जिसे कृष्ण अभितः ब्रह्मनिर्वाण कहते हैं।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: काम और क्रोध तो इंसान की फितरत है — क्या इन्हें सच में जीता जा सकता है?

हाँ — पर "जीतने" का मतलब दबाना नहीं है। प्रभुपाद जी कहते हैं — इन्हें भगवान की दिशा में मोड़ो। जब काम कृष्ण-सेवा बन जाए और क्रोध अधर्म के विरुद्ध उठे — तब वही काम और क्रोध मुक्ति का साधन बन जाते हैं।

सवाल: मैं गृहस्थ हूँ — क्या यह श्लोक मेरे लिए भी है?

बिल्कुल। स्वामी रामसुखदास जी स्पष्ट कहते हैं — यती वह है जिसने संयम का संकल्प लिया है। घर में रहते हुए भी, ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए भी — काम-क्रोध को साधा जा सकता है। बल्कि गृहस्थ जीवन तो इसकी सबसे बड़ी प्रयोगशाला है।

सवाल: गुस्सा आता है तो उस वक्त क्या करें?

स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — उस पल में बस रुको। एक पल के लिए साँस लो। उस पल में कृष्ण का नाम लो। गुस्से की आग को उस एक पल में बुझाना ज़रूरी नहीं — बस उस पल में कुछ मत करो। बाद में वह गुस्सा खुद कम हो जाता है।

सवाल: अभितः — यानी हर तरफ से शांति — क्या यह सच में सम्भव है?

यह कोई कल्पना नहीं है। जो लोग इस रास्ते पर चले हैं — संत, भक्त, साधक — उनकी जिंदगी इसका प्रमाण है। वे भी दुनिया में थे, परेशानियाँ उनके पास भी आती थीं — पर भीतर एक ऐसी शांति थी जो हिलती नहीं थी।

सवाल: आत्मज्ञान के बिना क्या काम-क्रोध से मुक्ति नहीं होती?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — आत्मज्ञान नींव है। पर नींव बनाने से पहले भी साधना चलती रहती है। भजन करो, सत्संग करो, गीता पढ़ो — यह सब धीरे-धीरे उस आत्मज्ञान की तरफ ले जाता है। रास्ते पर चलना शुरू करो — मंजिल खुद करीब आती है।

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🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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