आपने देखा होगा — जब कोई meditation class जाता है तो सबसे पहले यही सवाल होता है — "कहाँ बैठूँ? कैसे बैठूँ? क्या yoga mat चाहिए? क्या cushion?" यह सवाल सुनने में छोटे लगते हैं — पर असल में ये बहुत ज़रूरी हैं। क्योंकि जब बैठने की जगह और तरीका सही हो — तो ध्यान में उतरना बहुत आसान हो जाता है।
श्रीकृष्ण ने पाँच हज़ार साल पहले यही बात बताई थी। इस श्लोक में वे ध्यान के लिए स्थान और आसन की बहुत सटीक विधि देते हैं। और यह विधि आज भी उतनी ही relevant है — चाहे आप किसी भी युग में हों।
यह श्लोक 6.10 का अगला कदम है। वहाँ कृष्ण ने बताया था कि ध्यान के लिए मानसिक तैयारी क्या होनी चाहिए। यहाँ वे बता रहे हैं कि शारीरिक और बाहरी तैयारी क्या होनी चाहिए।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ६.११ ॥
सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?
श्रीकृष्ण कहते हैं — पवित्र स्थान पर अपना आसन स्थिर रूप से स्थापित करो — न बहुत ऊँचा, न बहुत नीचा। उस आसन पर पहले कुश घास बिछाओ, फिर मृगछाला, और ऊपर से कपड़ा।
तीन बातें यहाँ हैं। पहली — शुचौ देशे यानी पवित्र और साफ स्थान। दूसरी — स्थिर आसन यानी न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा। तीसरी — चैलाजिनकुशोत्तरम् यानी कुश, मृगछाला और कपड़े का आसन। यह तीनों मिलकर ध्यान के लिए सही बाहरी वातावरण बनाते हैं।
साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि
स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर कहते हैं कि शुचौ देशे — पवित्र स्थान — का मतलब केवल साफ जगह नहीं है। पवित्र का मतलब है — ऐसी जगह जहाँ मन अपने आप शांत हो जाए। जहाँ बहुत शोर न हो, जहाँ नकारात्मक ऊर्जा न हो, जहाँ मन बाहर की तरफ न खिंचे।
वे स्थिरम् आसनम् — स्थिर आसन — पर कहते हैं कि आसन की स्थिरता मन की स्थिरता से जुड़ी है। जब शरीर स्थिर होता है — तो मन भी स्थिर होने लगता है। इसीलिए आसन का हिलना-डुलना ध्यान को तोड़ता है। एक बार जहाँ बैठो — वहीं बैठे रहो।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचम् — न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा — पर स्वामी जी कहते हैं कि यह practical wisdom है। बहुत ऊँचे आसन पर बैठने से गिरने का डर रहता है — मन disturbed होता है। बहुत नीचे — ज़मीन पर सीधे — बैठने से ऊर्जा का क्षय होता है। मध्यम ऊँचाई सबसे उपयुक्त है।
कुश-मृगछाला-वस्त्र के बारे में स्वामी जी कहते हैं कि यह तीन परतें अलग-अलग काम करती थीं — कुश ज़मीन की नमी से बचाता था, मृगछाला ऊर्जा को preserve करती थी, और ऊपर का कपड़ा आराम देता था। आज के context में — एक clean yoga mat या ऊनी आसन यही काम करता है।
प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़
श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि यहाँ कृष्ण बहुत practical guidance दे रहे हैं। वे कहते हैं कि ध्यान के लिए बाहरी वातावरण का महत्व बहुत है — भले ही अंततः ध्यान अंदर की चीज़ है। जैसे एक अच्छे बीज को भी अच्छी मिट्टी चाहिए — वैसे ही अच्छे ध्यान को भी अच्छा वातावरण चाहिए।
वे शुचौ देशे पर कहते हैं कि पवित्र स्थान वह है जहाँ भगवान की उपस्थिति महसूस हो। मंदिर, नदी का किनारा, पहाड़ का शांत कोना — ये सब शुचि देश हैं। और घर में भी — जहाँ भगवान की मूर्ति हो, जहाँ नियमित पूजा होती हो — वह जगह पवित्र हो जाती है।
प्रभुपाद जी स्थिर आसन पर कहते हैं कि शरीर की स्थिरता ध्यान की पहली बाहरी शर्त है। जब शरीर हिलता-डुलता रहे — तो मन को एकाग्र करना बहुत मुश्किल हो जाता है। इसीलिए जो भी आसन चुनो — उसमें लंबे समय तक स्थिर रह सको।
स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या
स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज के modern seeker के लिए translate करते हैं। वे कहते हैं — कुश और मृगछाला आज उपलब्ध नहीं है सबके लिए। पर इस श्लोक का principle आज भी उतना ही valid है। एक dedicated spot — घर में एक कोना जो सिर्फ meditation के लिए हो — यही आज का शुचि देश और स्थिर आसन है।
वे कहते हैं — जब आप रोज़ एक ही जगह बैठते हैं — तो वह जगह खुद conditioned हो जाती है। जैसे ही आप उस कोने में जाते हैं — मन automatically थोड़ा शांत होने लगता है। यह Pavlov's conditioning की तरह है — पर spiritual direction में। इसीलिए एक dedicated spot बनाना बहुत important है।
स्वामी जी न अति उच्च न अति नीच को आज के context में समझाते हुए कहते हैं — बहुत comfortable sofa या bed पर बैठकर ध्यान करने की कोशिश करो — नींद आ जाती है। बहुत uncomfortable hard floor पर बैठो — दर्द से ध्यान टूटता है। एक firm cushion या yoga mat — जो comfortable भी हो और alert भी रखे — यही सही है।
असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?
घर में एक कोना चुनो — जहाँ ज़्यादा traffic न हो, जहाँ शांति हो। एक छोटी सी चौकी या दरी बिछाओ। ऊपर से एक ऊनी कपड़ा या yoga mat। अगर हो सके तो वहाँ भगवान की एक छोटी तस्वीर या मूर्ति रखो। यह बन गया आपका शुचि देश — आपका ध्यान स्थान।
और यह स्थान रोज़ use करो। चाहे 10 मिनट के लिए ही सही। धीरे-धीरे वह जगह एक energy build करती है — और जब भी आप वहाँ जाते हैं, मन automatically settle होने लगता है।
आसन की ऊँचाई के बारे में — अगर floor पर बैठते हो तो एक folded blanket या meditation cushion लो जो कूल्हों को थोड़ा ऊँचा करे। इससे रीढ़ सीधी रहती है और लंबे समय तक बैठना आसान होता है। यही है न अति उच्च न अति नीच का आज का practical रूप।
मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे
सवाल: क्या घर में पवित्र स्थान बनाना सच में ज़रूरी है — क्या कहीं भी ध्यान नहीं हो सकता?
स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — कहीं भी हो सकता है। पर एक dedicated spot होने से बहुत फर्क पड़ता है। वह जगह conditioned हो जाती है — और मन को settle होने में कम समय लगता है। शुरुआत में खासतौर पर यह बहुत helpful है।
सवाल: आज कुश और मृगछाला कहाँ मिलेगी — क्या यह outdated नहीं है?
स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — principle देखो, material नहीं। कुश-मृगछाला-वस्त्र की तीन परतें तीन काम करती थीं — ground insulation, energy preservation, और comfort। आज एक अच्छा yoga mat या ऊनी आसन यही तीनों काम करता है।
सवाल: क्या bed पर बैठकर ध्यान नहीं हो सकता?
प्रभुपाद जी कहते हैं — हो सकता है, पर नींद आने का खतरा रहता है। और नींद ध्यान नहीं है। एक firm surface पर बैठना — जहाँ शरीर alert रहे — ध्यान के लिए ज़्यादा उपयुक्त है।
सवाल: कौन सी दिशा में मुँह करके बैठना चाहिए?
इस श्लोक में दिशा का उल्लेख नहीं है। परंपरागत रूप से पूर्व या उत्तर दिशा में मुँह करके बैठना शुभ माना जाता है। पर सबसे ज़रूरी है — जहाँ बैठो वहाँ comfortable और stable रहो।
सवाल: 6.10 और 6.11 मिलकर क्या सिखाते हैं?
6.10 ने बताया — ध्यान के लिए मानसिक तैयारी क्या होनी चाहिए — एकांत, अकेलापन, मन का संयम, आशाओं का त्याग, अपरिग्रह। 6.11 बताता है — शारीरिक और बाहरी तैयारी क्या होनी चाहिए — पवित्र स्थान, स्थिर आसन, सही ऊँचाई। दोनों मिलकर एक complete preparation देते हैं।
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🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏