भगवद गीता 6.24 — इच्छाओं को जड़ से छोड़ो और मन से इंद्रियों को हर तरफ से रोको

Published: 29 जून 2026 भगवद गीता 6.24 — इच्छाओं को जड़ से छोड़ो और मन से इंद्रियों को हर तरफ से रोको 🇺🇸 Read in English

पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया था कि दुख के संयोग से वियोग ही योग है, और इसे दृढ़ निश्चय से साधना है। अब इस श्लोक से वे practical steps बताना शुरू करते हैं — actually कैसे करें यह साधना? पहला कदम क्या है?

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और पहला कदम है — संकल्प से उठी सभी इच्छाओं को छोड़ना। पूरी तरह, बिना किसी बचे-खुचे के। और साथ में — मन के द्वारा इंद्रियों को हर तरफ से वश में करना। यह दो काम एक साथ — यही योग की शुरुआत है।

यह श्लोक उन सबके लिए है जो जानते हैं कि ध्यान करना है, इंद्रियों को साधना है — पर practically कहाँ से शुरू करें? कृष्ण बहुत directly बता रहे हैं — शुरुआत इच्छाओं को समझने और उन्हें छोड़ने से होती है।

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।

मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥ ६.२४ ॥

सरल अर्थ — यह श्लोक कह क्या रहा है?

श्रीकृष्ण कहते हैं — संकल्प से उत्पन्न सभी इच्छाओं को बिना किसी शेष के त्यागकर, और मन के द्वारा ही इंद्रिय-समूह को हर तरफ से वश में करके।

यह श्लोक अपने आप में incomplete है — यह 6.25 के साथ मिलकर पूरा होता है। यहाँ दो काम बताए गए हैं — संकल्पप्रभवान् कामान् त्यक्त्वा सर्वान् अशेषतः यानी संकल्प से उठी सभी इच्छाओं को पूरी तरह त्यागना। और मनसा एव इंद्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः यानी मन से ही इंद्रियों को हर तरफ से वश में करना।

साधक-संजीवनी — स्वामी रामसुखदास जी की दृष्टि

स्वामी रामसुखदास जी साधक-संजीवनी में इस श्लोक पर बहुत गहरी बात कहते हैं। वे संकल्पप्रभवान् कामान् — संकल्प से उत्पन्न इच्छाएं — पर कहते हैं कि यहाँ कृष्ण एक बहुत महत्वपूर्ण बात बता रहे हैं। इच्छाएं कहाँ से आती हैं? संकल्प से। संकल्प यानी मन का वह भाव जो कहता है — "यह होना चाहिए", "यह मिलना चाहिए।" जब यह संकल्प उठता है — तो इच्छा जन्म लेती है। इच्छा पूरी न हो — क्रोध जन्म लेता है। इसलिए जड़ पर काम करना होगा — संकल्प पर।

वे अशेषतः — बिना किसी शेष के — पर बहुत ज़रूरी बात कहते हैं। वे कहते हैं — half-hearted त्याग काम नहीं करता। अगर 99 इच्छाएं छोड़ीं और एक रखी — वह एक इच्छा फिर 99 को वापस ला देगी। जैसे एक छेद वाली नाव डूब जाती है — वैसे ही एक बची हुई इच्छा पूरी साधना को कमज़ोर कर देती है।

मनसा एव इंद्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः — मन से ही इंद्रियों को हर तरफ से वश में करना — पर स्वामी जी कहते हैं कि इंद्रियों को वश में करने का tool मन है — कोई बाहरी force नहीं। और समन्ततः — हर तरफ से — यानी कोई भी इंद्रिय बाहर न रहे। एक इंद्रिय भी बेकाबू हो — तो वह बाकी सबको खींच लेगी।

प्रभुपाद जी — भगवद गीता ऐज़ इट इज़

श्रील प्रभुपाद जी Bhagavad Gita As It Is में इस श्लोक पर कहते हैं कि यह verse 6.23 से शुरू हुए practical instruction section का first step है। कृष्ण ने define किया था — योग क्या है। अब वे बता रहे हैं — कहाँ से शुरू करें।

वे संकल्पप्रभवान् कामान् पर कहते हैं कि desire की origin को समझना बहुत important है। Desire संकल्प से आती है — mental resolution से। जब मन में यह thought settle हो जाता है कि "मुझे यह चाहिए" — तो desire बन जाती है। इसलिए desire को उसकी origin पर काटना होगा — संकल्प पर।

प्रभुपाद जी मनसा एव — मन से ही — पर ज़ोर देते हैं। वे कहते हैं — इंद्रियों को force से नहीं रोका जाता। Force से रोकने पर वे और ज़ोर से वापस आती हैं। मन को ही redirect करना होता है — और जब मन redirect हो जाए, इंद्रियाँ स्वाभाविक रूप से follow करती हैं। इसीलिए भक्तियोग सबसे effective है — क्योंकि वह मन को directly कृष्ण में redirect करता है।

स्वामी मुकुन्दानंद जी की व्याख्या

स्वामी मुकुन्दानंद जी इस श्लोक को आज की psychology से जोड़ते हैं। वे कहते हैं — modern psychology भी यही कहती है कि desires थoughts से start होती हैं। जो thought आप entertain करते हो — वह desire बन जाती है। जो desire बन जाती है — वह action demand करती है। इसलिए root पर काम करना ज़रूरी है — thought पर, संकल्प पर।

वे अशेषतः — बिना शेष के — पर एक practical example देते हैं। वे कहते हैं — अगर कोई smoking छोड़ना चाहे और कहे "मैं 99% quit करता हूँ, बस एक cigarette रोज़ रखता हूँ" — तो वह quit नहीं हुआ। उस एक cigarette से habit बनी रहती है। वैसे ही इच्छाओं का त्याग complete होना चाहिए — काम चलाऊ नहीं।

स्वामी जी समन्ततः — हर तरफ से — पर बहुत important बात कहते हैं। वे कहते हैं — अक्सर लोग एक-दो इंद्रियों को साधते हैं और बाकी को छोड़ देते हैं। जैसे खाना तो control किया पर entertainment में बह जाते हैं। या meditation करते हैं पर conversation में बेकाबू हो जाते हैं। समन्ततः कह रहा है — हर तरफ से। संपूर्ण संयम। यही effective है।

असली जिंदगी में यह कैसा दिखता है?

सोचिए — आप social media scroll कर रहे हैं। एक thought आती है — "काश मेरे पास भी ऐसी life होती।" यह संकल्प है — और इससे इच्छा जन्म लेती है। अगर आप उस thought को उसी moment notice करें और उसे entertain न करें — "यह मेरा संकल्प है जो इच्छा बना रहा है" — तो आप उसे जड़ से काट रहे हैं। यही है संकल्पप्रभवान् कामान् त्यागना

या office में कोई colleague ने कुछ ऐसा किया जिससे आपको बहुत gussa आने वाला था। पर उसी moment में मन ने उस situation को hold किया — "यह मेरी इंद्रिय का reaction है, मैं इसे control करूँगा" — और गुस्सा नहीं निकाला। यह है मनसा इंद्रियग्रामं विनियम्य

और समन्ततः — हर तरफ से — रोज़ की ज़िंदगी में यह दिखता है जब आप खाने में संयम रखते हैं, entertainment में संयम रखते हैं, बातों में संयम रखते हैं — सब एक साथ। कोई एक area बेकाबू नहीं। यह comprehensive discipline ही काम करती है।

मन के सवाल — जो आपके दिल में भी उठते होंगे

सवाल: सभी इच्छाओं को बिना शेष के छोड़ना — क्या यह humanly possible है?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — यह एक ideal है जिसकी तरफ बढ़ना है। एक बार में सब नहीं होगा — पर direction यही होनी चाहिए। हर इच्छा जो कमज़ोर होती है — वह एक कदम है।

सवाल: मन से इंद्रियों को वश में करना — पर मन खुद बेकाबू है, तो कैसे?

प्रभुपाद जी कहते हैं — इसीलिए कृष्ण में मन लगाने की बात है। जब मन को एक higher object मिल जाता है — कृष्ण — तो वह automatically lesser objects में कम जाता है। मन को control नहीं करते — redirect करते हैं।

सवाल: संकल्प और इच्छा में क्या फर्क है?

स्वामी मुकुन्दानंद जी कहते हैं — संकल्प वह मानसिक भाव है जो इच्छा को जन्म देता है। "यह मिलना चाहिए" — यह संकल्प है। और जब यह पक्का हो जाता है — तो यह इच्छा बन जाती है जो action demand करती है। संकल्प cause है, इच्छा effect है।

सवाल: क्या एक बार इच्छाएं छोड़ दें तो वे वापस नहीं आतीं?

स्वामी रामसुखदास जी कहते हैं — आती हैं। इसीलिए निरंतर अभ्यास ज़रूरी है। पर हर बार जब आप उस इच्छा को recognize करके उसे entertain नहीं करते — वह थोड़ी कमज़ोर होती है। धीरे-धीरे।

सवाल: 6.23 और 6.24 मिलकर क्या सिखाते हैं?

6.23 ने बताया — योग क्या है (दुख से वियोग) और कैसे साधें (दृढ़ निश्चय, बिना हताशे)। 6.24 बताता है — पहला practical step क्या है — संकल्पजनित इच्छाओं का पूर्ण त्याग और मन से इंद्रियों का सर्वतः संयम। Definition के बाद first action step — यह sequence बहुत clear है।

🙏 हरे कृष्ण — जय श्रीकृष्ण 🙏

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